यदि हास्य की व्यापकता को ध्यान में रखकर इसका विवेचन किया जाता है तो निश्चय ही काव्यशास्त्र में इसको अगंभीर या साधारण सहायक रस मान कर छोड़ा न जाता।
विद्वानों का ध्यान प्रारंभ में शायद इसीलिए इस रस की ओर नहीं गया कि उन्होंने इसे हलका-फुलका भाव समझ लिया था। इसके प्रभाव की ओर ध्यान नहीं गया। आधुनिक युग में तो हास्य के माध्यम से सामाजिक क्षेत्र में रूढ़ियों और अंधविश्वासों पर प्रहार करने का कार्य बड़ी सशक्त शैली से हो रहा है।
श्री गोपालप्रसाद व्यास ने अब से अर्धशताब्दी वर्ष जब सहज स्फूर्ति हास्य को स्वीकार किया था तब शायद उन्हें भी इसके व्यापक प्रभाव का ज्ञान न था। बाबू गुलाबरायजी की भैंस के उत्पात को उन्हें हंसी-मज़ाक में चित्रित करते हुए एक ऐसी हास्य-सृष्टि की थी जो श्रोता या पाठक को आनंदोल्लास से विभोर करने वाली थी। 'अक्ल बड़ी या भैंस' एक पुरानी कहावत है- जाहिर है कि इसमें अक्ल की प्रशंसा है और भैंस की विशाल काया पर मूर्खता का आरोप। व्यास ने अपनी पैनी अक्ल से इस तथ्य को सप्रमाण साबित करने के लिए 'ओ, बाबूजी की डबल भैंस' कविता की रचना कर डाली। हास्यकवि की यह आदि रचना ही उसके भावी उत्कर्ष के बीज छिपाये हुए थी। इसमें संदेह नहीं कि इसी कविता से व्यास का अंतर्मुखी हास्य प्रकट होकर सामाजिकों के लिए उल्लास का विषय बना। जिस समय व्यास हिन्दी कविता में अवतरित हुए, हास्यरस एक उपेक्षित रस के रूप में सिसक रहा था। कविवर व्यास ने हास्य को सबसे पहले साहित्यिक शैली से साहित्य के रूपों पर प्रहार करने के लिए चुनकर आह्लादक भूमि पर प्रतिष्ठित किया।
हास्य-विनोद एक उपकारी वृत्ति है, जो व्यक्ति हास्य-विनोद लिखकर जनमानस को उत्फुल्ल बनाता है वह एक बड़े उपकार का अनुष्ठान करता है। अभी तक हास्य के इस पक्ष पर न तो विद्वानों का ध्यान गया और न सामाजिकों ने हास्य के इस उपयोगी पक्ष पर ध्यान दिया। जिस ज़िदादिली से हास्य फूटता है उसी उद्दाम वेग से प्रस्तर खंडों से निर्झरिणी का स्रोत फूटता है। जिस प्रकार निर्झर के सीकर जलधारा का रूप धारण कर नदी और महानद बनते हैं उसी प्रकार हास्य के स्निग्ध छींटे आनंद और उमंग के अजस्र स्रोत बनकर उल्लास का सागर बहाने में समर्थ होते हैं। व्यास ने अपने काव्य द्वारा इस तथ्य को प्रमाणित किया है। हिन्दीप्रेमी जनता के लिए हास्य के धरातल पर व्यास का काव्य आनंद का सागर पैदा करने वाला बन गया है। दिनभर के काम-काज के थके हुए, दफ्तरों की जड़ता से मुरझाए हुए, मालिकों की झिड़कियों से सताए हुए तथा पत्नियों की फरमाइश से सकपकाए हुए व्यक्तियों के लिए व्यास की कविता से बढ़कर और कोई त्राण का स्थान नहीं है। व्यास की कविता पढ़कर मन में केवल शान्ति और शीतलता ही नहीं आती, वरन् साहस और सम्बल भी प्राप्त होता है।
हिन्दी-कविता में व्यास ने एक नवीन रस का एक नवीन वाद की स्थापना की है। नवीन रस है परिवार-रस। परिवार-रस का आलम्बन शास्त्रानुमोदित कोई एक विशिष्ट व्यक्ति न होकर परिवार के अंगभूत के सभी व्यक्ति हैं जो परिवार को संगठित करते हैं। पति-पत्नी, सास-ससुर, बेटा-बेटी, भाई-भतीजे, बुआ, मामा, चाचा, काका-काकी सभी को इसमें समान अधिकार है।