संयुक्त परिवार प्रणाली को मानने वाले भारतवर्ष में परिवार-रस की कल्पना इतने विलम्ब से हुई यही आश्चर्य का विषय है। परिवार-रस के माध्यम से वात्सल्य, श्रृंगार, वीर, हास्य और करुण की जैसे मिश्रित छटा देखने में आती है वैसी किसी अन्य रस में नहीं है। इसे भावसंधि न कहकर स्वतंत्र रस ही माना जाना चाहिए। इस रस के माध्यम से भारतीय परिवार की कल्पना को सुदृढ़ आधार प्राप्त होता है और सामाजिक संगठन
की एक विशिष्ट इकाई को भलीभांति समझा जा सकता है। परिवार रस की पुष्टि में व्यास ने अनेक कविताएं लिखकर इस रस की स्थापना की है। पति के मित्र, कुछ नहीं समझ में आता है, दीवाली के दिन, साला, माहात्म्य, पलकों पर किसे बिठाऊं मैं, आदि कविताएं इस रस का सुंदर निदर्शन हैं।
'पत्नीवाद' को काव्य में व्यास ने जिस रूप में स्वीकार किया है वह सर्वथा नूतन है। पत्नी के प्रति आस्था और निष्ठा की अभिव्यक्ति आदर्शवादी कवियों के काव्य में भी नहीं मिलती। हां, पति-पूजा का उपदेश सभी ग्रंथों में मिलता है। मर्यादावादी अथवा आदर्शवादी कवियों ने गूंगे, बहरे, काने, कुंजड़े तथा कोढ़ी पति की पूजा का उपदेश दिया है और कहा है कि पत्नी का धर्म है कि वह पति को परमेश्वर मानकर पूजे। आश्चर्य है त्याग और तपस्या की मूर्ति भारतीय पत्नी की ओर किसी कवि और लेखक का ध्यान नहीं गया। व्यास ने इस उपेक्षा का पत्नीवाद की प्रतिष्ठा द्वारा निरसन् करने का प्रयास किया है। यों कहने को तो व्यास ने शायद पत्नी के महत्व को व्याजस्तुति में गाया हो, लेकिन शनैः शनै पत्नी के माहात्म्य का उन्हें घर के भीतर ही अनुभव होता गया और अपनी हास्य-कविताओं में पत्नी को वाद के रूप में उन्होंने स्वीकार कर लिया। पत्नी के सहारे सामाजिक व्यंग्य लिखने की प्रेरणा प्राप्त करने वाले कवियों में शायद हिन्दी के प्रथम कवि व्यास ही हैं। संस्कृत के कुछ कवियों में पत्नी के विषय के फुटकर श्लोक लिखे थे किंतु पत्नीवाद का लेखा व्यास की रचनाओं में ही पाया जाता है। पत्नी के शासन, पीड़ित पतियों की करुण कथा व्यास ने जिस मार्मिक शैली से गाई है वह व्यंग्य-विनोद के साथ आज के परिवर्तित सामाजिक संबंध की कहानी है। समाज में पति-पत्नी की एकता कायम हो सकती है किंतु कितनों को होती है, वह विचारणीय है। पत्नी-पीड़ित पतियों की दशा का वर्णन करने में व्यास की लेखनी ने बड़े चमत्कार पैदा किए हैं। कुछ दुर्बल पति अपने घर की दशा और पत्नी की फटकार से घर छोड़ते भी देखे जाते हैं और वे घिघियाते हुए कहते हैं-
"सुनती है, कल मैं जाऊंगा
जिस तरह गये थे कभी बुद्ध।
मैं वापस कभी न आऊंगा,
किसलिए हो असहाय क्रुद्ध।
ऐ गोपी सोती रहो, आज
यह नया तथागत जाएगा
आंखें खोलो, दर्शन कर लो,
फिर पंछी हाथ न आएगा।"
पृष्ठ-3