हास्य के क्षेत्र में व्यासजी का योगदान

(डॉ0 विजयेन्द्र स्नातक)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

आज की अल्ट्रामार्डन पत्नी पर कटाक्ष करते हुए व्यास ने जो फब्तियां कसीं हैं वे किसी भी आधुनिका पर सौ फीसदी खरी उतरती हैं-पत्नी को परमेश्वर मानने की नेक सलाह देते हुए कविवर व्यास कहते हैं कि जब आपकी आधुनिका पत्नी -

"मित्रों से जब वह बात करें
बेहतर है तब मत सुना करो।
तुम दूर अकेले खड़े-खड़े,
बिजली के खंबे गिना करो।
तुम उनकी किसी सहेली को,
मत देखो, कभी न बात करो।
उनके पीछे उनके दराज से,
कभी नहीं उत्पात करो।
यदि जग में सुख से जीना है,
कुछ रस की बूंदें पीना है।
तो हे विवाहितो, आंख मूंद
मेरे कहने को सच मानो।
पत्नी को परमेश्वर मानो।"
पत्नी के संबंध में प्राचीन एवं अर्वाचीन विचारधाराओं की दृष्टि रखते हुए व्यास ने जो मार्मिक व्यंग्य लिखे हैं वे हिन्दी साहित्य में सर्वथा नूतन हैं। आधुनिका नारी के पत्नीत्व के पाश को छिन्न-भिन्न कर जो स्वातंत्र्‌य स्वीकार किया, व्यास ने उस पर तीखा कटाक्ष करते हुए 'मैं भी अब हड़ताल करूंगी' शीर्षक कविता में जो भाव व्यक्त किया है वह पठनीय है-
"पहले यह मंजूर करो,
पत्नी इस घर की दास नहीं है।
व्यास-फ्यास कुछ नहीं,
बस, 'बीवीदास' कहाना होगा।"
पत्नी के अनेक रूपों पर दृष्टि रखते हुए भी व्यास ने उसकी वत्सलमूर्ति का चित्र क्यों नहीं खींचा, यह आश्चर्य की बात है। परिवार-रस में डूबकर पत्नीवाद का गीत गाने वाले को अपने दर्जन बच्चों के बीच रहकर भी पत्नी के वात्सल्य ने सिक्त क्यों नहीं किया? जग्गो की जीजी तक ही सिमट कर वह क्यों रह गए, यह विचारणीय है।
हास्य के माध्यम से सामाजिक संगतियों, राजनीतिक विडम्बनाओं और धार्मिक प्रपंचों पर व्यास ने बड़े तीखे प्रहार किए हैं। साहित्य के विविध वादों और सम-सामायिक परिवर्तनों पर भी उनकी दृष्टि गई है और हास्य की मीठी चुटकी द्वारा उनके स्वरूप का उदघाटन किया है। 'चले आ रहे हैं' शीर्षक कविता -संग्रह की पहली कविता है 'कवि हूं प्रयोगशील'- इस कविता में प्रयोगवादी कविता के आदि संकलन 'तारसप्तक' का व्यास ने जो चित्र खींचा है वह तत्कालीन प्रयोगशील कविता की गतिविधि को समझने में बड़ा सहायक है। प्रयोग के नाम पर जो अब प्रयोग होने प्रारंभ हुए थे उन पर बड़ा सीधा और तीखा व्यंग्य इस कविता में दृष्टिगत होता है-
"श्रोता हजार हों कि गिनती के चार हों,
परंतु मैं सदैव तारसप्तक में गाता हूं।
आंख मींच, सांस खींच जो भी लिख देता उसे,
आपकी कसम नई कविता बताता हूं।
ज्ञेय को बनाता अज्ञेय, सतचित्‌ को शून्य,
देखते चलो मैं आग पानी में लगाता हूं।
अली की कली की बात बहुत दिनों चली,
अजी, हिन्दी में देखो छिपकली चलाता हूं।"

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