''सौभाग्य से मैं भी एक पति हूं। गृहस्थी की गाड़ी में जुते काफी दिन होगए हैं।

अगर मेरी आवाज़ में जरा भी दम है और आपकी सहानुभूति के स्तर को तनिक भी छू सकती है, तो भाइयो और बहनो, पतियो और पत्नियो, पूरे जोर के साथ, भुजा उठाकर कहता हूं पत्नी नहीं, आज पति सताया हुआ है। शोषित आज पति है, पत्नी नहीं। पतियों के जुल्म के दिन तो हवा हुए, अगर हमें मानवता की रक्षा करनी है तो पहले सब काम छोड़कर पत्नियों के जुल्मों से असहाय पतियों की रक्षा करनी होगी।''
- कुछ पतियों की भी तो सुनिए।
''कविजी दिनभर पेट साफ करते हुए, गला मांजते रहे, मालिश करते रहे, बनते-संवरते रहे, मगर जब फील्ड में पहुंचे तो कोई पहली ही गेंद पर उड़ गया, कोई टिप-टिप चार कदम चला, किसी को मंच पर बैठे कवियों ने ही लपक लिया, तो किसी के विकिट जनता ने उखाड़ फेंके। गरज यह कि बड़े-बड़े तीरन्दाज चारों खानों चित्त होगए। इस पर भी उनके नखरों में, अंदाज़ में कहीं कोई कमी नहीं थी।''
- मैंने कवि सम्मेलन किया।
''एक युग था जब वह गुफाओं में आराम से रहता, शिकार करता और ठाठ से पड़ा-पड़ा खर्राटे भरा करता था-न ऊधो का लेन, न माधो का देन। पर अकल जो आई, समाज बना और इज्जत-आबरू की चाह होने लगी। इन सबका परिणाम हुआ कि मकड़ी अपने जाले में खुद उलझ गई। अब तो यह हाल है कि आदमी समाज से परेशान है, सभ्यता से परेशान है और सोसायटी से परेशान है, और तो और अपने बीवी-बच्चों से भी उसे चैन नसीब नहीं। परेशानी की इस कहानी का सिलसिला यहीं समाप्त नहीं होता। आप हैरान होंगे कि जिसे आज रखा है और कल निकाला जा सकता है उस नौकर के मारे भी आदमी की नाक में दम है।"
ऊपर व्यास के हास्य-प्रधान निबंधों में से कुछ उदाहरण प्रस्तुत कर मैंने उनके प्रवाहपूर्ण गठन की ओर पाठकों का ध्यान आकृष्ट करना चाहा है। इस प्रकार के अनेक सुंदर गद्य-खंड व्यास के लेखों में भरे पड़े हैं।

संक्षेप में, व्यास ने जिस सहज आत्मीय भाव से हास्य को स्वीकार किया है वह उनके गद्य-पद्य रूपों में समान भाव से व्याप्त है। व्यास के समक्ष हास्य केवल हलका-फुलका विनोद मात्र न होकर तीक्ष्ण व्यंग्य, कटाक्ष, प्रहार का साधन भी रहा है। राजनीति, साहित्य, धर्म और समाज व्यवस्था को लक्ष्य बनाकर जैसा मनोहारी गद्य व्यास ने लिखा है उसका हिन्दी जगत में विधिवत् आकलन नहीं हुआ, मूल्यांकन की तो बात दूर है। व्यास को हास्यरस का कवि मानकर ही श्रोता संतुष्ट हो जाते हैं। हिन्दी में सतत् वर्तमान हास्य-साहित्य को देखते हुए मेरा अनुरोध है कि हास्य का शास्त्रीय तथा व्यावहारिक दोनों स्तरों पर पुनर्मूल्यांकन होना चाहिए और हास्य के द्वारा जो विपुल संभावनाएं सामने आ रही हैं उनको स्वीकार करना चाहिए। आज हास्य केवल व्यंग्य-विनोद या चतुरालाप तक ही सीमित नहीं रह गया है, वह सभी क्षेत्रों में अपना प्रभाव चोट, कटाक्ष और प्रहार के द्वारा जमाता जा रहा है। हिन्दी में इस पथ को व्यास ने जितनी शक्ति के साथ खोला और प्रशस्त किया है उतना पहले किसी ने नहीं किया है। आज उनके साहित्य की संभावनाएं और अधिक बढ़ गई हैं, इसलिए उनसे हिन्दी जगत और अधिक शिष्ट, संयत, सशक्त और प्राणवान हास्य की अपेक्षा रखता है।
('शलाका पुरुष पं. गोपालप्रसाद व्यास' से, सन् 2001)
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