करते रहे हैं। उन्हीं के कारण नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा और उसका हिन्दी-साहित्य-विद्यालय भी, आज के अनेक गणमान्य विद्वानों और साहित्य-सेवियों के आश्रय-स्थल रहे हैं। अस्तु।
'साहित्य संदेश' में व्यासजी के आने से एक नई जान आ गई।
आचार्य पं0 महावीरप्रसाद द्विवेदी, आचार्य पं. रामचंद्र शुक्ल, महाकवि प्रसाद आदि पर उसके जो विशेषांक निकले, उनकी योजना को सफल बनाने का कार्य व्यासजी का ही था। इसके साथ ही विभिन्न विषयों पर अधिकारी विद्वानों से लेख लिखाना और जिस विषय पर लेख न उपलब्ध हों, उस पर स्वयं लिखना भी उन्हीं के जिम्मे था। अपने इस उत्तरदायित्व का वह भलीभांति निर्वाह करते थे। यही कारण था कि इन विशेषांकों ने 'साहित्य-संदेश' को इतना लोकप्रिय बना दिया कि उसकी ग्राहक-संख्या दिन-प्रतिदिन बढ़ने लगी और व्यासजी की पत्रकार-प्रतिभा को भी विकसित होने का अवसर मिला। परम श्रद्धेय बाबू गुलाबराय का सान्निध्य और हिन्दी के मूर्धन्य लेखकों से संपर्क, इन दोनों ने मिलकर व्यासजी को हिन्दी-साहित्य में विख्यात कर दिया।

सन् 1939 से सन 1941 तक मैं सूरत और बम्बई में हिन्दी-प्रचारक का कार्य करके जब वापस आगरा लौटा, तब पता चला कि व्यासजी 'हास्य-रस' के कवि हो गए हैं। तुकबंदी का मुझे भी शौक रहा है। इसलिए पत्रकार व्यासजी के कविरूप में अवतरित होने पर मुझे आश्चर्य-मिश्रित प्रसन्नता हुई। साहित्यतीर्थ बाबू गुलाबराय की भैंस से प्रेरणा पाकर लिखी गई 'बाबूजी की डबल भैंस' शीर्षक प्रथम हास्य-रस की कविता ने उन्हें हास्य-रस के कवि के रूप में वैसे ही लोकप्रिय बना दिया, जैसे महाकवि निरालाजी को उनकी 'जुही की कली' ने बना दिया था। ब्रजभाषा में भी कुछ कवित्त-सवैये उन्होंने लिखे और वह कवि-सम्मेलनों में जाने लगे। मुझे याद है कि गुजरात से लौटकर जब मैं आया था, तब एक बार हापुड़ में अभिन्न मित्र श्री क्षेमचन्द्र 'सुमन' ने एक सुन्दर कवि-सम्मेलन का आयोजन हापुड़-निवासी प्रो0 श्यामसुन्दर मिश्र के साथ मिलकर किया था, जिसमें व्यासजी, सुधीन्द्रजी और मैं सम्मिलित हुए थे और इसका सभापतित्व किया था, 'साहित्य-संदेश' के संपादक बाबू गुलाबराय ने। उस कवि-सम्मेलन में पहली बार मैंने व्यासजी को हास्य-रस के सफल कवि के रूप में देखा। उनकी कविताएं सुनते-सुनते श्रोता अघाते ही न थे। उस कवि-सम्मेलन का मैदान उन्हीं के हाथ रहा था।
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