कुछ दिनों बाद पता चला कि व्यासजी ने 'साहित्य-संदेश' छोड़ दिया है और दिल्ली में प्रसिद्ध कथाकार
श्री जैनेन्द्रकुमार के यहां लेखक होकर चले गए हैं। (यह स्मरणीय है कि जैनेन्द्रजी स्वयं नहीं लिखते, बोलकर लिखाते थे।) वहां भी वह बहुत दिन न रहे और 'दैनिक हिन्दुस्तान' में सहकारी संपादक के रूप में कार्य करने लगे। 'दैनिक हिन्दुस्तान' में आकर उनकी पत्रकारिता और काव्य-साधना को प्रशस्त भूमि मिली।
प्रति सप्ताह और विशेष अवसरों पर इनकी रचनाएं 'हिन्दुस्तान' में छपने लगीं। उन रचनाओं ने उनकी लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए, कवि-सम्मेलनों में उनकी तूती बोलने लगी और वह अखिल भारतीय
ख्याति के कवि हो गए। उनकी हास्य-रस की कविताओं में मौलिकता उनकी पत्नी के केन्द्र में होने से आई और 'पत्नीवाद' नामक एक नये वाद के प्रवर्तक के रूप में उनका नाम लिया जाने लगा।
अनेक कवि-सम्मेलनों में मेरा और उनका साथ हुआ है और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि जब उनकी कविता का यौवन काल था, तब कवि-सम्मेलनों में हास्य-रस के कवि के नाते उनकी ही धूम रहती थी।

उन्होंने गद्य में भी अच्छे व्यंग्य-लेख लिखे हैं, लेकिन हिन्दी साहित्य में वह अपनी हास्य-कविताओं के लिए ही स्मरण किए जाएंगे। उनकी हास्य-कविताओं का ऐतिहासिक महत्व है।
तीन वर्ष पहले मेरी भेंट उनसे धौलपुर में हुई थी। मैं धौलपुर प्रदर्शनी के कवि-सम्मेलन का अध्यक्ष होकर गया था और व्यासजी कवि के नाते पहुंचे थे। कवि-सम्मेलन से भी अधिक आकर्षण की बात उनके लिए यह थी कि धौलपुर में उनके बड़े लड़के की ससुराल भी है। उस कवि-सम्मेलन से हम साथ-साथ ही बस से लौटे थे। हमारा यह साथ बहुत दिन बाद हुआ था। अनेक विषयों पर चर्चा और हंसी-मजाक हुआ। उस समय भी उनकी मस्ती में तो कोई कमी मैंने नहीं देखी, पर उनकी आंखों ने उन्हें जो दगा दिया, उससे वह दुखी थे। लेकिन हौंसले वाला आदमी कभी नियति से हारता नहीं और व्यासजी भी ऐसे ही हौंसले वाले हैं।
भारत सरकार ने उन्हें 'पद्मश्री' से अलंकृत किया और मित्र-मंडली ने उनकी स्वर्ण जयंती मनाने का आयोजन किया है, यह प्रसन्नता की बात है। अल्प साधन-सम्पन्न व्यक्ति का सम्मानित होने योग्य ऊंचाई तक पहुंचना प्रेरणाप्रद होता है। मुझे आशा है, मित्रों के प्रेम और सदभाव से व्यासजी शतायु होंगे और मां भारती की अनवरत सेवा करते रहेंगे।
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)