बिना किसी पूर्व सूचना के व्यासजी ने आव देखा न ताव ( उस समय हमारी जेब में कोई कविता भी नहीं थी) हमारा नाम सभापति-पद के लिए घोषित कर दिया। बोले -''अब आप उदघाटन में दो शब्द कहेंगे।" हम भी कच्चे नहीं थे, कह दिया-''अब कवि-सम्मेलन शुरू हो !" और बैठ गए। बाद में सभा व्यासजी ही चलाते रहे। कवि-सम्मेलन को वह इस सहजता से चलाते हैं, गोया 'नारदजी खबर लाए हैं' लिख रहे हों-वह उनके बाएं हाथ का खेल है।
व्यास कुशल संगठनकर्त्ता हैं। राजभाषा सम्मेलन में सब भाषाओं के हिन्दी प्रचारकों को एकत्र कर लेना उनकी संगठन-कुशलता का प्रमाण है। कन्हैयालाल पोद्दार और राजर्षि टंडन अभिनंदन ग्रंथ उन्होंने ही संयोजित किए हैं, संस्मरणीय ।
हास्य-रस के निर्वाह में सबसे बड़ी कठिनाई एकरसता से बचना है। 'एजी सुनो, ओजी सुनो', 'सास-ससुर' सब विषय समाप्त होगए। 'उनका पाकिस्तान' भी बन गया। कुछ दिन व्यासजी ने राष्ट्रीय रचनाएं लिखीं, आजाद हिन्द फौज पर कविताएं लिखीं-'कदम-कदम बढ़ाए जा !' व्यंग्य-लेख भी लिखे। पर श्रोता हैं कि वे व्यासजी की हास्य-कीर्ति के कारण उनकी कोई भी चीज गंभीरता से नहीं लेते। आलसियों और काहिलों की स्तुति में कविता खूब चली। फिर उनके व्यंग्य निबंध, जैसे 'श्री 420' कई लोगों पर सचोट फिट हुए। 'मैं आदम हूं, तुम हउआ हो' के साथ-साथ इस बीच नारदजी बराबर वीणा बजाते रहे। उनके नारदजी वाले कालम से कुछ अंश नमूने के तौर पर यहां दे रहा हूं। जैसे हिन्दी भाषा के लिंग भेद पर 30-9-62 और 7-10-62 के हिन्दुस्तान में उन्होंने लिखा-
''व्यासजी, हिन्दीवालों का यही अहंकार तो हिन्दी की तरक्की नहीं होने देता। अपनी छाती को विशाल बनाइए। अपने दिमाग की खिड़कियां खोल लीजिए। नया-नया शब्द और वाक्य रचना आने दीजिए। अहिन्दीवालों की कठिनाई हिन्दी का लिंग ही तो है। वह कब पैन्ट पहन लेता है और कब साड़ी बदल आता है, यह पता नहीं चलता। जब तक हिन्दी में यह लिंग का झगड़ा रहेगा, तब तक अहिन्दीवाला उसके पास नहीं आ सकता। मेरी सलाह मानिए। भगवान एकलिंग को नमस्कार करके लिंग का मोह छोड़ दीजिए। इससे आपकी भाषा 'बढ़ेगी'। वह जल्दी ही राजभाषा हो -'जाएगा'।
"बंगला लोग और दक्षिण का आपका भाई-बहन भाषा में नर-नारी के झगड़े को नहीं समझ पाता, इसलिए जब गरीब-अमीर होगया है, ऊंच-नीच का भेद चल गया है तो नर-नारी का भेद भी रहने नहीं सकता। इसको भी जाना ही होगा। आप इसमें हमारी थोड़ी मदद कीजिए। नारियां जिस काम को उठा लेता हैं, वह कभी अधूरा नहीं रहता। आपकी पंजाबी बहनों ने हिन्दी पढ़ना सीखा, प्रभाकर पास किया, अपने पतियों को हिन्दी में पत्र लिखने लगा तो पतियों को भी हारकर हिन्दी सीखना पड़ा। दक्षिण में भी आजकल बहन लोगों को बड़ी तादाद में हिन्दी सीखना पड़ा। लाचार होकर उनके पतियों, पुत्रों और भाइयों को भी हिन्दी पढ़ना पड़ रहा है।''
क्लब में राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन था। भी हिन्दी पढ़ना पड़ रहा है।''
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