नारदजी ने भाषा संबंधी प्रश्नों पर खूब व्यंग्य लिखे हैं। अंग्रेजी के अंधमोह वालों की तो खूब खिल्ली उड़ाई है। जैसे-अंग्रेजी-हिन्दी की तुलना में 25-2-62 को लिखा-
''हमें भी तैश आ गया। मेज पर मुक्का मारकर कहा, कितने एम0ए0 पास आज ऐसे हैं, जो अच्छी तरह अंग्रेजी लिख और बोल सकते हैं ? दूसरी भाषा में बोलने में हिचक और कठिनाई स्वाभाविक होती है। खासतौर से उस भाषा में, जिसके लिंग और वचन का पता नहीं। यह स्त्रीलिंग है या पुल्लिंग, इसका फैसला आज तक नहीं हो पाया।
गेहूं खाया भी जाता है और खाई भी जाती है। मैं आपसे पूछता हूं, कुर्सी स्त्रीलिंग क्यों है, उसका पुल्लिंग बताइए क्या होगा ? इस प्रकार के अनिश्चित प्रयोग करके कोई प्रामाणिक और विद्वान व्यक्ति अपना उपहास नहीं करा सकता। कहना बहुत आसान है, करना नहीं। हिन्दीवाले तमिल में भाषण करके बताएं, तब हम उनकी बहादुरी की प्रशंसा कर सकते हैं। यूं तो 'पर-उपदेश कुशल बहुतेरे' सब होते हैं।''
नारदजी के पिता व्यास पहले महाकवि भी रहे। सो अखबारी व्यंग्य-विनोद में भी साहित्यिक सरसता कहां टूट पाती है ? शब्दों पर आधारित हास्य के भी दर्शन हो जाते हैं। कभी-कभी बड़ी साहित्यिक छटा नारदजी दे देते हैं, जैसे 17-3-63 में 'सत्य' पर या 'योग-विद्या' पर, 5-5-63 में 'अमरीका गमन' पर, उदाहरण के लिए 23-3-63 में उन्होंने लिखा-
''जिसको कहते हैं सत्य, सत्य नहीं होता है। हंसता रहता है जो, अन्दर से रोता है। विज्ञ जिसे कहते हैं, वह पाला हुआ तोता है। पा गया कहता जो, समझो वही खोता है। यह तो अजीब है।''
''जी हां, लक्ष्मी-पति ही सबसे गरीब है। शासक ही शासित है, गुह्य ही प्रकाशित है। नाई ही ब्राह्मण है, ब्राह्मण ही नापित है। ''
भारत की योग-विद्या पर विश्वास करने वालों को नारदजी ने संयोग से कैसे शब्द-विनियोग में डाल दिया। देखिए-
''नारदजी कहे जा रहे थे- 'व्यासजी, गज की पुकार पर पलक मारते विष्णु आ पहुंचे। ऋषियों ने आहुति दी और देवता यज्ञ में उपस्थित। अनुसुइया ने त्रिदेवों को बालक बनाकर अपने यहां पाल लिया। विश्वामित्र ने राम को अणु-बम से भी अमोद्य अस्त्र प्रदान किए, अर्जुन को इन्द्र ने 'नारायण अस्त्र' दिया तथा युधिष्ठिर सदेह स्वर्ग गए- ये सब कपोल कल्पनाएं हैं। नहीं-नहीं। भारतीय योग-विद्या के चमत्कार हैं। आज संसार से यह विद्या लुप्त होगई है।' हमने आकुल होकर प्रश्न किया, ''नारदजी यह विद्या इस धरती पर अब पुनः कब प्रकट होगी ?''
पति की पाताल-यात्रा (अमरीका गमन) पर पत्नी की यह गुहार सुनिए- ''तभी मंत्रीजी की पत्नी ने प्रभुजी से पुकार की। विश्वम्भर, तेरा दिया सब कुछ है। तू रंक को राजा, मूक को वाचाल, वज्रमूर्ख को महापंडित और अपने अदना से भक्त को मिनिस्टर बनाने वाला है। यह तेरी ही कृपा का प्रसाद है कि हम न-कुछ, सब कुछ होगए और तेरी ऐसी ही मेहर रही तो हम और क्या न हो जाएंगे, हमें स्वयं इसका कुछ पता नहीं।
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