व्यासजी का नाम अब हिन्दी हास्य-रस का पर्यायवाची-सा बन गया है। मैं तो परिहास में कहता हूं कि हिन्दी में सम्प्रति 'गो' युग चल रहा है। हिन्दी-सेवा और गो-सेवा दोनों का (मेरा भी) बड़ा गहरा संबंध रहा है। जो सचमुच 'गो' (यानी इन्द्रियों) को 'पाल' ले उसका व्यास (यानी घेरा) बहुत 'महतोमहीयान' होता है।
संस्कृत 'गो' से अलग 'गो' शब्द का अंग्रेजी में अर्थ 'जाना' है, फिर भी हमने यह जाना है कि हिन्दी में आज का युग 'गो' नाम से शुरू होने वालों का जरूर है। अकेले राजभाषा सम्मेलन (26-1-65) में उपस्थित लेखकों को लीजिए तो 'गो' विन्दप्रसाद केजरीवाल, 'गो' पालकृष्ण कौल, 'गो' पाल शर्मा, 'गो' पालदास 'नीरज' इत्यादि-इत्यादि। वैसे हिन्दी का सर्वश्रेष्ठ उपन्यास भी तो 'गो' दान है।
व्यासजी के नारद से बालमुकुन्द गुप्त के 'शिवशंभु के चिट्ठे' की याद आ जाती है। राजनीतिक-सामाजिक व्यंग्य लेखन की यह परंपरा पुरानी है। हिन्दी में कई लोगों ने इसका प्रयोग किया था, भारतेन्दु हरिश्चन्द्र से लगाकर भ्रमरानन्द, विनोद शर्मा और कुट्टिचातन तक। बेढब बनारसी के 'लफ्टंट पिगसन' और विश्वम्भरनाथ शर्मा कौशिक के 'विजयानन्द' तो अभी-अभी के हैं। पुराणों के नारदजी बहुत मनोरंजक 'कैरेक्टर' रहे हैं। अंग्रेजी उपन्यासकार आर0 के0 नारायण 'नारद की जीवनी' नामक उपन्यास लिख रहे हैं। तुलसी के नारद को एक बार 'नारद मोह' होगया था, पर व्यासजी का नारद बड़ा निर्मोही है। यह नारद पहले लंबी-चौड़ी हास्यपरक बात विस्तार से कहता था। अब संकटकालीन स्थिति बहुत गंभीर है, इसलिए थोड़ी-सी जगह में ही संतुष्ट है। पर कहता है अपनी बात उतनी ही मार्मिकता से। व्यासजी का यह नारद-चरित्र हिन्दी-जगत की अवचेतन मनसा है, जो हम उतनी अच्छी तरह, उतनी स्पष्टता से व्यक्त नहीं कर पाते, उसे नारद खूबी से कह देता है। अतः व्यास को हिन्दी में इसके लिए लाखों पाठक धन्यवाद देते हैं, मन-ही-मन !
इस प्रकार व्यासजी का निर्मल बचपना-भरा हास्य-विनोद चिरतरुण, चिरयुवा है। उनके हास्य ने लोगों की आयु बढ़ाई है। वह भी दीर्घायु हों, यही कामना है !
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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