दिल्ली में मेरा और व्यासजी का साथ लगभग 3 वर्ष तक रहा। 1945 में यकायक दिल्ली छोड़कर मुझे कानपुर आना पड़ा। लेकिन आजादी के बाद जबसे लालकिले में राष्ट्रीय कवि-सम्मेलन का आयोजन शुरू हुआ, तबसे प्रतिवर्ष मुझे वहां बुलाया जाता। बहुत सालों बाद तक यह क्रम चलता रहा। उन दिनों लालकिले के कवि-सम्मेलनों में तीन गोपालों का प्रभाव सर्वाधिक था, ये थे- गोपालप्रसाद व्यास, गोपालकृष्ण कौल और गोपालदास नीरज। ये तीनों गोपाल लालकिले में उसी प्रकार छाए रहे जैसे हरियाणा की राजनीति में तीन लाल- बंसीलाल, भजनलाल और देवीलाल।
चीन-युद्ध के समय श्री बालकवि बैरागी और श्री काका हाथरसी का लालकिले के कवि-सम्मेलन में प्रवेश हुआ। बालकवि बैरागी की ओजपूर्ण कविताएं और काका हाथरसी की हास्य-कविताएं बहुत वर्षों तक लालकिले के कवि-सम्मेलन का कंठहार बनती रहीं। काका हाथरसी तो व्यासजी के बाकायदा शिष्य थे और व्यासजी का वरदहस्त सदैव ही उनके सिर पर रहा। व्यासजी ने लालकिले के कवि-सम्मेलनों में अनेक नए कवियों को प्रवेश दिलवाया और साथ-ही-साथ उसे एक उच्चस्तरीय आयोजन का दर्जा दिया। इन कवि-सम्मेलनों में पंडित जवाहरलाल नेहरू से लालबहादुर शास्त्री तक आए और उनकी अध्यक्षता दद्दा मैथिलीशरण गुप्त, श्री सुमित्रानंदन पंत, श्री बालकृष्ण शर्मा 'नवीन', दिनकर, बच्चन जैसे मूर्धन्य कवियों ने की। इन कवि-सम्मेलनों का इतिहास जब भी लिखा जाएगा, तब श्री गोपालप्रसाद व्यास का नाम बड़ी श्रद्धा से लिया जाएगा। जैसे हर कला की लोकप्रियता अपने उच्च स्तर की सीमा पर पहुंचकर पतन की ओर मुड़ती है -वैसा ही कालान्तर में इन कवि-सम्मेलनों में अनधिकृत अनेक कवियों के प्रवेश से इसका स्तर गिरने लगा और सच्चे तथा अच्छे कवियों ने इनमें भाग लेना बंद कर दिया। पहले लालकिले के कवि-सम्मेलन में भाग लेना गौरव की बात समझी जाती थी।
लेकिन अब वैसा कुछ नहीं है। अब इन कवि सम्मेलनों में भौंडी राजनीति, गाली-गलौच और घिसे-पिटे चुटकलों के अलावा और कुछ सुनने को नहीं मिलता। अब इन कवि सम्मेलनों में अच्छी कविताएं हूट की जाती हैं और खराब कविताएं सराही जाती हैं। श्रोताओं को ऐसा मोतियाबिंद हुआ है कि हीरे फेंककर कंकड़ बटोरते हैं और उनसे संतुष्ट भी होते हैं। हिन्दी-कविता के इस दुर्भाग्य पर और कवि-सम्मेलनों की इस दुर्दशा पर सिर्फ आंसू ही बहाए जा सकते हैं।
व्यासजी एक श्रेष्ठ कवि, एक श्रेष्ठ पत्रकार और एक श्रेष्ठ गद्य लेखक होने के साथ-साथ एक धुनी व्यक्ति भी हैं। उन्हें किसी चीज की धुन लग जाए तो वे तब तक दम नहीं लेंगे, जब तक उस काम को पूरा न कर लें। उनकी इसी धुन का फल है दिल्ली का 'हिन्दी भवन' जिसे वे एक तीर्थ के समान मानते हैं और जिसे बनाने में उन्होंने अपना सारा जीवन ही होम कर दिया।
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