व्यासजी ने झोंपड़ी से लेकर महल तक का सफर तय किया है। इस सफर में उन्होंने कितना गर्द-गुबार ओढ़ा और बिछाया है और कितना खून-पसीना बहाया है, इसे वही समझ सकता है जिसने उन्हें निकट से देखा है। अब वे 85

वर्ष के हैं-उनका शरीर काफी थक चुका है, लेकिन उनका मन आज भी जवान है और कुछ नया करने की लालसा संजोए हुए है। सुख और सौभाग्य की बात ये है कि कविता और अच्छे कवि-सम्मेलनों की ध्वजा उनके सुपुत्र गोविंद व्यास ने बड़ी मजबूती से संभाल रखी है। गोविंद का प्रभाव देशव्यापी हिन्दी कवि-सम्मेलनों पर उसी प्रकार पड़ा है, जिस प्रकार कभी व्यासजी का था।
व्यासजी की जिंदगी संघर्षों और पुरुषार्थ की एक लंबी कहानी है। उनके 86वें वर्ष पर मैं उनका अभिनंदन करता हूं और उनके दीर्घायु की कामना इन शब्दों के साथ करता हूं :
"तुमने ये दिखला दिया कि पौरुष के आगे
मुश्किल को अपनी ही मुश्किल पड़ जाती है।
हिम्मत गर हारे नहीं मुसाफिर अपनी तो,
मंजिल खुद उसको बढ़कर गले लगाती है।"
('शलाका पुरुष पं. गोपालप्रसाद व्यास' से, सन् 2001)
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