ब्रजभाषा के सवैये और कवित्त वह धाराप्रवाह रूप से सुनाते थे और ब्रज-मंडल की बड़ी-बड़ी पढ़ंतों में उन्होंने अपने प्रतिद्वन्द्वियों को परास्त कर श्रोताओं से जय-जयकार पाया था। इसके अलावा बचपन की जो बात मुझे याद रह गई है वह यह है कि व्यासजी ने अपनी पारिवारिक परिस्थितियों से विवश होकर एक प्रेस में कम्पोजीटर के रूप में काम करना शुरू किया था, और जब मैं हाई स्कूल की कक्षा में अपने हस्तलिखित पत्र 'भूषण' के लिए फार्म छपाने गया था तो व्यासजी को एक केस के सामने स्टूल पर बैठे देखा था।
पर कम्पोजीटर का काम व्यासजी ने ज्यादा दिन नहीं किया। मैं सोचता हूं, यह उपयुक्त स्थान है, उस साहित्यिक क्रान्ति की याद करने का, जो मथुरा के वातावरण में सत्येन्द्रजी ने उपस्थित की थी। सत्येन्द्रजी सन् 33 के आसपास चम्पा अग्रवाल हाई स्कूल मथुरा में अध्यापक होकर आए थे और आते ही उन्होंने अपने गहरे साहित्यानुराग और उससे गहरे शिक्षानुराग के द्वारा केवल विद्यार्थियों को ही नहीं, नगर के सभी साहित्य-प्रेमियों को अपने इर्द-गिर्द जमा कर लिया था। हम लोग जो विद्यार्थी थे, वे तो उन्हें 'गुरुदेव' ही कहते थे। उनकी सिद्धांत-निष्ठा, आदर्शवादिता, कर्मठता और सादगी एक संक्रामक रोग की तरह हम लोगों में प्रवेश कर गई थी और देखते-देखते सत्येन्द्रजी का एक अदृश्य गुरुकुल मथुरा में स्थापित होगया था, जिसके प्रमुख सदस्यों में क्रमशः मेरे बड़े भाई श्री विद्याभूषण अग्रवाल, मथुरा के प्रसिद्ध एडवोकेट श्री शर्मनलाल अग्रवाल, पद्मश्री गोपालप्रसाद व्यास, दिल्ली के प्रसिद्ध पत्रकार श्री जगदीशप्रसाद चतुर्वेदी और नेशनल लाइब्रेरी के हिन्दी-विभाग के अध्यक्ष श्री कृष्णाचार्य रहे। यद्यपि कुछ दिनों बाद सत्येन्द्रजी के आगरा-प्रयाण के कारण गुरुकुल की यह परंपरा और आगे न बढ़ पाई, तथापि उन्होंने जो ज्योति मथुरा में जगाई थी, वह आज तक दम देती रही है और उनके ये शिष्य अपने आपको एक परिवार का अंग मानकर चलते रहे हैं।
व्यासजी के संबंध में मेरे अगले संस्मरण भी आगरा-प्रवास के ही हैं। बात यह है कि बड़े भाई की देखा-देखी मैं भी सेंट जॉन्स कालेज में भरती होगया था और हम दोनों गोकुलपुरे में एक घर लेकर रहते थे। घर की देखभाल भाभी करती थीं। उन्हीं दिनों व्यासजी मथुरा से हमारे घर पधारे। वह और कोई उपाय न पाकर उन दिनों 'साहित्यरत्न' की परीक्षा की तैयारी कर रहे थे और 'साहित्यरत्न' का केन्द्र उन दिनों आगरे में ही था। वह महीनों हमारे यहां रहे, वहीं रहकर उन्होंने शानदार ढंग से 'साहित्यरत्न' की परीक्षा पास की और फिर प्रसिद्ध समीक्षा-पत्रिका 'साहित्य संदेश' के सह-सम्पादक बन गए।
जिस प्रकार मथुरा में सत्येन्द्रजी ने एक साहित्य-क्षेत्र का निर्माण किया था, ठीक उसी प्रकार आगरा में 'साहित्य संदेश' के तेजस्वी संपादक-संचालन और 'साहित्य-रत्न-भण्डार' के अध्यक्ष महेन्द्रजी ने भी एक महत्वपूर्ण साहित्य-क्षेत्र का निर्माण किया था। सच तो यह है कि सत्येन्द्रजी के व्यक्तित्व के निर्माण में महेन्द्रजी का काफी हाथ रहा है और इसलिए सत्येन्द्रजी का सारा गुरुकुल सहज ही 'साहित्य संदेश' परिवार का अंग बन गया है।
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