व्यासजी- मेरे बालसखा

(भारतभूषण अग्रवाल)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

'साहित्यरत्न' की परीक्षा पास करने के बाद जब व्यासजी की आजीविका का प्रश्न उठा, तो महेन्द्रजी को उन्हें काम देते एक पल भी न लगा और व्यासजी धूमधाम से 'साहित्य संदेश' के संपादन-मंडल में और नागरी प्रचारिणी सभा, आगरा के शिक्षक-मंडल में स्थापित होगए। लगता है कि यहीं से व्यासजी को अपना सही पथ प्राप्त हुआ। यहीं रहकर उन्होंने ब्रज-साहित्य-मंडल की स्थापना में योगदान दिया और फिर उसके विस्तार और विकास में, यहीं रहकर वह श्री बनारसीदास चतुर्वेदी, श्री जैनेन्द्रकुमार और श्री सियारामशरण गुप्त के संपर्क में आए और दिल्ली में उन्होंने जो महान साहित्य-कार्य किया है, उसकी भूमिका तैयार हुई। यह ठीक है कि 'साहित्य संदेश' का सीमित क्षेत्र व्यासजी की प्रतिभा को समेट न पाता था और जल्दी ही उन्हें वहां से हटकर फैलना पड़ा। पर जितने दिन व्यासजी 'साहित्य संदेश' में रहे, उसके प्रत्येक अंक पर उनके श्रम और उनकी दृष्टि की छाप मौजूद रही। वह पत्र को मौलिक साहित्यिक प्रश्नों में लगाना चाहते थे। महेन्द्रजी उसका स्वरूप अधिकांश में परीक्षोपयोगी रखना चाहते थे। 'साहित्य संदेश' तो जरूर परीक्षोपयोगी ही रहा, पर व्यासजी के प्रयत्नों से कुछ दिनों तक उसमें महत्वपूर्ण साहित्यिक प्रश्नों की भी चर्चा रही। उदाहरण के लिए आलोचना के मानदंड संबंधी चर्चा का श्रीगणेश व्यासजी के तत्वावधान में 'साहित्य संदेश' ने ही किया था। आगरा में शिक्षा समाप्त कर मैं कलकत्ता भटक गया और व्यासजी दिल्ली चले आए। हम दोनों के जीवन की गतिविधियां बहुत भिन्न और दूर होगईं। संपर्क तो रहा, पर उतना सामीप्य न मिल सका। उनके दिल्ली-जीवन की मेरे मन पर जो छाप है, वह यही कि वह बाजार सीताराम में या शायद लाल कुंआ में एक टीन के सायबान में रहते थे और गमछा लपेटे बाजार में निकल आते थे। उनकी इस फक्कड़ तबीयत ने ही उन्हें पहले-पहल जनप्रिय बनाया और इस जनप्रियता की पूंजी से ही उन्होंने साहित्य सम्मेलन के काम को धीरे-धीरे इतना गहरा जमा दिया कि आज वह प्रशंसा का ही नहीं, ईर्ष्या का भी विषय है। सन्‌ 53 के अंत में जब मैं दिल्ली आया तो व्यासजी कीर्ति अर्जित कर चुके थे। हिन्दी की सेवा का मार्ग उन्होंने प्रशस्त कर लिया था और उसे वह अपने जीवन का लक्ष्य बना चुके थे। यह स्वाभाविक ही था कि एक नगर में रहकर हम निकट आते और एक-दूसरे की सहायता करते। पर सचाई यह है कि जहां तक सहायता का प्रश्न है, वह तो व्यासजी ही करते रहे हैं, और मेरे न करने का उन्होंने कभी बुरा नहीं माना। बीच-बीच में वह यह भी कहते रहे हैं कि अब मैं मन से काफी परिपक्व और संतुलित होगया हूं। इसे मैंने अपने प्रमाणपत्र से भी अधिक इस बात का सबूत माना है कि व्यासजी की उदारता और दूरदृष्टि अब बहुत व्यापक होगई है। इसीलिए मुझे अपार आनंद तो हुआ, पर आश्चर्य ज़रा भी नहीं, जब उन्हें भारत सरकार ने 'पद्मश्री' की दुर्लभ उपाधि से विभूषित किया। व्यासजी के सामने अभी पूरी अर्द्धशताब्दी बिछी हुई है और उन्हें अभी बहुत से उपयोगी कार्य करने हैं। इसलिए विस्तृत संस्मरण का समय अभी नहीं आया है। मैं उनके इस सम्मान में पूरी हार्दिकता से योगदान करना चाहता हूं।

('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन्‌ 1966)

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