दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव

(बालकवि बैरागी)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
हिन्दी को 'पत्नीवाद', 'सालीवाद', 'सालावाद' जैसे 'वाद' देने वाले व्यासजी ने उस समय हास्य पर अपनी कमल चलाई जब हास्य 'सीमित' था। उसको 'ठहाके' तक ले आने वाले व्यासजी अपने आप में बहुत गंभीर और शालीन लगते हैं। मेहमानों भरा पूरा घर और दिल्ली को तीर्थ मानकर भटकने वाले नए कवियों के लिए अपने घर को धर्मशाला तक में बदल देने वाले गोपालप्रसाद व्यासजी पर उनके अपने ही यारों ने कौन-सी चोटें नहीं कीं। कल जो उनके साथ था, आज वह उनका विरोधी बनकर सरेबाजार गाली बक रहा है, पर परसों वह फिर व्यासजी के साथ चाय पी रहा है और किसी साहित्यिक संस्था के चुनाव की गोटें बिठा रहा है। व्यासजी पूरी तटस्थता से मज़ा ले रहे हैं। उनसे पूछा कि गुरु, आज आप इन्हें चाय पिला रहे हैं। क्या रहस्य है ? उत्तर में व्यासजी के पास केवल एक मुस्कान है। यह मुस्कान अपने आप में श्लेष का सवैया है।
हिन्दी कविता में उनकी नोटिस आलोचकों ने कितनी ली और कितनी नहीं, इस बहस में व्यासजी कभी नहीं पड़े। आज कवि-सम्मेलनों में उनकी दो पीढ़ियां बराबर कविता पढ़ रही हैं। एक वे खुद और दूसरे उनके पुत्र गोविंद व्यास। बहस और मतभेद का जहां तक सवाल है, आज व्यासजी की कविता का सबसे बड़ा आलोचक खुद उनका बेटा गोविंद है। धीरे से टोह ली- ''चाचाजी ! ये गोविंद को क्या होगया है ? कैसी बातें करता है ?'' तो व्यासजी ठहाका लगाकर बोले-" स्साले ! मैं कविता और कवि ही पैदा नहीं करता, आलोचक भी पैदा करता हूं।"
मुझे एक ही बात पर दर्द हो जाता है जब व्यासजी के समूचे व्यक्तित्व को लालकिले के कवि-सम्मेलन से बांध दिया जाता है। व्यासजी के साथ यह सरासर अन्याय है। लालकिले के कवि सम्मेलन को व्यासजी ने पैदा किया है, पर मात्र यही कवि-सम्मेलन व्यासजी का सृजन नहीं। यह उनकी गतिविधियों का एक अंशमात्र है। सारे भारत के सभी प्रांतों से हिन्दी की नई प्रतिभाओं को लालकिले पर लाने के लिए व्यासजी वर्षभर मेहनत करते हैं। न जाने किस-किस से पूछताछ करते हैं और उन कवियों को जनता के सामने प्रस्तुत करने का साहस करते हैं। यह सब वे निर्लिप्त होकर करते हैं। हिन्दी के सवाल पर वे अपनी 'पद्मश्री' लेकर राष्ट्रपति भवन जाते हैं और उसको लौटा आते हैं। महामूर्ख सम्मेलन करके हर साल वे दो-एक कुंठित राजनेताओं को जनता की भीड़ में तन कर खड़ा होने का अवसर जुटा देते हैं। वे जानते हैं कि वे क्या कर रहे हैं। यश की गंगा हमेशा उनके पीछे से होकर बह गई, पर वे कभी शिकायत की मुद्रा में नहीं आए। उनकी मुस्कान बराबर बनी रही।




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