कवि व्यास, हास्यरस के

(ओमप्रकाश आदित्य)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
व्यासजी हास्य-रस के कवि हैं, लोग उनसे अधिक उनके 'साले', 'साली' और 'सलवार' से ज्यादा परिचित हैं। वह जहां जाते हैं मुसकुराहट और मस्ती उनकी छाया बनकर साथ चलते हैं। मनहूसियत, उदासी और उद्विग्नता के रोगी का
यदि कहीं इलाज न हो सके तो वह सप्ताह-दो सप्ताह व्यासजी का संग करे, उनकी बातें सुने, उनके मुसकुराते हुए मुखमण्डल को निहारे, उसके रोगों की जड़, जड़ से कट जाएगी। ऐसे मानसिक रोगों की उनके पास अचूक बूटी है। मैं व्यासजी को विनोद और हंसी का ही अक्षय वट समझता था, किन्तु एक दिन जब उन्होंने भावविभोर होकर अपने गुरु श्री नवनीत के तथा अन्य रीतिकालीन श्रृंगारिक कवियों के भक्तिपरक कवित्त सुनाए, तब मैं आश्चर्य से उनकी भक्तिभाव में डूबी मुद्रा को देखता रह गया। मैंने यह कभी सोचा भी नहीं था कि महफिलों में, सम्मेलनों में तथा मित्र-मंडली में सदा चुटकियां लेने वाले व्यासजी इतने भावुक, इतने विभोर और इतने गंभीर हो सकते हैं। यहां आकर व्यासजी में आलोचकों का यह मत सर्वथा खंडित हो जाता है कि हास्य-रस का कवि भावुक नहीं होता।
रीतिकालीन साहित्य की अप्रकाशित सरस्वती का एक अपूर्व भण्डार व्यासजी को कण्ठस्थ है। नायिका-भेद और नखशिख-वर्णन के ऐसे अनूठे कवित्त और सवैये उनकी वाणी पर विराजते हैं कि बड़े-बड़े दिग्गज पी.एच.डी. सामूहिक रूप से उनमें समा जाएं। रीतिकालीन कविता पर जिसे शोध करना हो, वह व्यासजी के निकट रहकर पढ़े, उनके चरणों को पखारे, साहित्य की अनुपलब्ध मणियां उसे आशीर्वाद में मिल जाएंगी। व्यासजी स्वयं ब्रजभाषा के सुन्दर कवि हैं, उनके आलंकारिक शैली में लिखे हुए मधुर भक्ति-पदों को अनेक बार सुनने का मुझे सौभाग्य मिला है। व्यासजी ने अभी पिछले दिनों उन्हें पुस्तकाकार कराने का निश्चय मेरे आग्रह को स्वीकार करके किया है।
व्यासजी एक चलते-फिरते महाग्रंथ हैं, जिसमें महाभारत की विशाल कथाओं से लेकर घरेलू विज्ञान के ज्ञान तक का अपरिमित भण्डार है। हिन्दी, संस्कृत और उर्दू कविताओं के इतने उद्धरण उन्हें याद हैं कि चाहें तो सुबह से शाम तक उद्धरणों में ही बातें करते रहें। उनका व्यावहारिक ज्ञान मार्के का है। वास्तव में ज्ञान की कोई विधा उनसे बची नहीं है। चाहे वह राजनीति हो, चाहे समाजनीति सबमें व्यासजी की अदभुत गति है।
व्यासजी में एक ऐसा विशेष गुण है, जो दूसरे साहित्यकारों में आसानी से नहीं आ पाता। वह जितना नए लेखकों को प्रोत्साहन देते हैं, उतना ही अपने साथी लेखकों का आदर करते हैं। दूसरों के गुणों पर रीझना, कला की किरणों को प्रकाशित होते देखना उनके स्वभाव में रम गया है। अनेक कवियों ने व्यासजी का स्नेह और प्रोत्साहन पाकर हिन्दी-कविता में अपना विशेष स्थान बनाया है। कविता चाहे शत्रु के मुख से भी निकले, व्यासजी उसकी मुक्त-कंठ से दाद देते हैं और उस कवि के भविष्य को एक सुन्दर रूपरेखा बनाने का प्रयत्न करते हैं। इसका मूल कारण उनका हिन्दी के प्रति अटूट, अगाध प्रेम और कविता के प्रति अपने हृदय का उत्कट अनुरोध है। हिन्दी उनके रक्त का रंग है। उनका जीवन है। उसकी प्रगति और सम्मान के लिए वह किसी से भी लड़-मरने को तैयार है। इसमें संदेह नहीं कि हिन्दी के प्रचार, प्रसार एवं प्रतिष्ठा के लिए सबसे अधिक परिश्रम एवं ठोस कार्य स्वतंत्रता-प्राप्ति के पश्चात व्यासजी ने ही किया है।
जिन वरिष्ठ विद्वानों एवं कलाविदों के प्रयत्नों तथा लगन से हिन्दी राजभाषा के सुसम्मानित पद पर आसीन हुई है, उनमें व्यासजी का नाम प्रथम पंक्ति में लिखा जाने योग्य है। अपनी मातृभाषा के लिए भगीरथ-प्रयत्न करने वाला यह भागीरथ कला का सच्चा साधक है। साहित्य का कर्मठ आराधक है। कविता के प्रति, कवियों के प्रति अत्यंत उदार है और हिन्दी-कविता की तथा कवियों की उन्नति देखकर हिन्दी के आगे अपना सिर ऊंचा उठाने में गर्व का अनुभव करता है।

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