व्यासजी को मैंने कभी उन्मना नहीं देखा। गीता के उस स्थितप्रज्ञ की-सी स्थिति में मैं उन्हें सदा देखता हूं, जिसे दुःख-सुख, लाभ-हानि आदि का विकार मलिन एवं उद्विग्न नहीं करता। बहन पुष्पा के ठीक विवाह के दिन घर में भरी भीड़ से बचकर एक कोने में बैठे अपना लेख लिखते हुए मैंने उन्हें देखा है। सम्मेलन के बड़े-से-बड़े उत्सवों पर भी उनकी साहित्यिक दिनचर्या में कोई हेर-फेर कभी नहीं हो पाया है। 'संकट' और 'घबराहट' ये दो शब्द उनके शब्दकोश से या तो शुरू से ही मिटे हुए हैं या उन्होंने स्वयं कभी अपने पुरुषार्थ के सामर्थ्य से मिटा दिया है। दुःख-सुख के विभिन्न अवसरों पर उनकी मुद्राओं के कोई अलग-अलग चित्र लेना चाहे तो उनमें काल-भेद हो सकता है, मुद्रा-भेद नहीं।
जीवन के प्रति उनका दृष्टिकोण कितना सशक्त, स्पष्ट और विनोदपूर्ण है, यह एक घटना से स्वतः स्पष्ट हो जाता है। व्यासजी और मैं अस्पताल से हिन्दी के एक वयोवृद्ध कवि के दर्शन करके लौट रहे थे, जो हृदय-रोग से रुग्ण थे। व्यासजी ने टैक्सी में बैठे-बैठे ही जीवन-मृत्यु के प्रसंग के बीच सहज भाव से कहा -''मृत्यु से भयभीत होकर रहना भी कोई जीवन है ? रोग से हार मान लेना जीवन की सबसे बड़ी पराजय है। ओमप्रकाश ! मैं विश्वासपूर्वक कहता हूं, मैं ऐसे थककर कभी नहीं गिरूंगा। रोगों के आघातों से शिथिल होकर नहीं मरूंगा। जब भी मृत्यु आएगी उससे कुश्ती लड़ूंगा, या तो मैं उसे ले रहूंगा या वह मुझे ले रहेगी। पर अपने साथ उसे खिलवाड़ नहीं करने दूंगा।'' उनकी इस विनोदपूर्ण उक्ति में गीता बोलती है। संपूर्ण भारतीयता, पुरुषार्थ और कर्म की कसौटी पर खड़ी होकर उत्साह और उमंग के स्वर में समय को ललकारती है। इस उक्ति में मृत्यु का उपहास तथा पराजय और जीवन की विजय एक-दूसरे के कितने समीप है।
मैंने अपने ऐसे मित्रों को परखा है, जो कालिजों में प्रोफेसरी की नौकरी पा जाने पर अपना रहन-सहन बदल देते हैं, स्वभाव में हेर-फेर कर लेते हैं तथा एक के स्थान पर दो-तीन सूट सिलाकर उनकी क्रीज का विशेष ध्यान रखने लगते हैं। ऐसे नीम डाक्टरों से भी पाला पड़ा है, जिन्होंने पी.एच.डी की पूंछ पाते ही टेढ़ा चलने की आदत डाल ली है। अपनी मित्र-मंडली में घटौती कर दी है और कम बोलना तथा कम खाना शुरू कर दिया है। पर व्यासजी का व्यक्तित्व तो ऐसा है कि पद्मश्री की ऊंची उपाधि पाकर भी टस-से-मस नहीं हुआ।
सब कुछ पूर्ववत ही है। अब भी 'गांधी पार्क' में व्यासजी उसी तरह टहलने जाते हैं, ग्रामीण जवानों की कबड्डी देखते हैं, गांधी-मूर्ति के आसपास महफिल लगाकर बैठे मनचले बूढ़ों की शायरी सुनते हैं, एकतारे पर तुलसी की रामायण गाने वाले अंधे सूरदास की पीपरमेंट की गोलियां खरीदते हैं और चम्पी तेल मालिश वालों से उनका घर से भागने का कारण पूछकर, उन्हें उनके मां-बाप की याद दिलाकर घर लौट जाने को प्रेरित करते हैं। ऐसे हैं ये कवि व्यास-
"दिल के उदार, दिलदार, कलाकार ऊंचे,
रस कर रसिक सुरसना सरस के।
जरा के मरण के , गुमानी अभिमानियों के,
एक के न चार के हजार के न बस के।
पत्नी के परम, नरम सालियों के लिए,
चरम धरम प्यारे सास सर्वस के।
हिन्दी के हुलास, काव्यवाणी के विलास,
वीणापाणि के सुहास, कवि व्यास हास्य-रस के।"