अकेली 'नवेली ललना' को गोविंद द्वारा ग्रहण किए जाने पर 'प्यारीन' के नेत्रों से 'मैन' की कहानी सुनने में व्यासजी किसी भी रीतिकालीन कवि से पीछे नहीं हैं। निम्न छंद में संपूर्ण अंगों के निर्वाह के साथ रस का परिपाक हुआ है। गत्यात्मक सौंदर्य एवं रीति के पूर्व की विभिन्न चेष्टाओं के चित्रांकन का कौशल देखने योग्य है-

"ललना नवेली कौं अकेली लखि आंगन में,
औचकि गुबिन्द ताहि धाय गहिबे लगे।
छुटकि छबीली नै जु सास को बतायों पास,
चौंकि चकराए बिसमै में बहिबे लगे।
पीठि दै प्रबीनी हंसी, लाल हंसे हिय लाइ,
दोनों यौं बिनोद में समेद बहिबे लगे।
पानीदार प्यारी के, कमानीदार नैन 'व्यास'
एन मैन मैन की कहानी कहिबे लगे।"
अभिसारी नायिका के चित्रण में कवि ने अपने सौंदर्य-बोध का परिचय अछूती उपमाओं से इस प्रकार दिया है-
"आनन अनंगना के आई है अमल ओप
अंगन उमंगन के उठत हिलोरे-से।
कनक-छरी-सी, मछरी-सी नई बछरी-सी,
रस-बंसुरी-सी, चढ़ी मदन हिंडोरे-से।
'व्यास' कवि बैस की किसोरी भाव भोरी याके,
नैन चित-चोरे-से, मरोरे-से कटोरे-से।
ललित लुनाई लिए, ललक ललाई भरे,
मद झकझोरे, कोरे, अधर सकोरे-से।"
व्यासजी को धार्मिक, ऐतिहासिक और साहित्यिक स्मारक के अंचल में जन्म लेने का सौभाग्य प्राप्त हुआ है। वहां के दगरों तथा गली-गलियारों में व्यासजी के पहले-पहले वसंत ने अपनी चितवन फेंकी है, वहां रज भी उनके लिए चंदन है। ऐसी भूमि का ऋण उन्होंने काव्य के माध्यम से चुकाया है। सुर, नर तथा गंधर्व आदि सभी के लिए गिरिराज पूजनीय है-
"सुर पूजैं नखत लै, नर पूजैं आखत लै,
गुनि-गंधर्व पूजैं ताल सुर बाजैं लै।
मगन महेस पूजैं, गगन सुरेस पूजैं,
पगन गनेस पूजैं, रिद्धि-सिद्धि साजैं लै।
सारद सुजान पूजैं, नारद महान पूजैं,
सकल जहान पूजैं, गान गुन गाजैं लै।
गोपी-गोप-गाय पूजैं, 'व्यास' कवि धाय पूजैं,
बाबा नंदराय पूजैं, गोद ब्रजराजैं लै।
'गिरिराज' शब्द के उच्चारण का माहात्म्य निम्न पंक्तियों में वर्णित है, यहां धार्मिक आस्था और भी प्रखर होगई है-
'गि' अथ कहे तैं, गिर जात पाप छार ह्वै कैं,
'र' बिच कहें तैं, रज-दोख दूरि भागै हैं।
'रा' ही के कहे तैं, राधारानी अनुकूल हौंई,
'ज' इति कहे तै 'व्यास' हूं के भाग जागै हैं।
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