ब्रज की माधुरी और व्यासजी

( सोम ठाकुर )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !
इससे स्पष्ट है कि वास्तव में व्यासजी का भाग्योदय क्यों हुआ है।

सेनापति के अतिरिक्त समस्त ब्रजभाषा काव्य में ऐसे कवि बहुत कम हैं, जिन्होंने प्रकृति का आलम्बन रूप में चित्रण किया है। व्यासजी 'वसंत' में इसी दिशा में अग्रसर हुए हैं। इस रचना में शैली की दृष्टि से वह नंददास के निकट हैं। इसमें कवि का सूक्ष्म निरीक्षण तथा वर्ण-परिज्ञान दर्शनीय है-

"आज बसंत बहार, खिली सरसों की कलियां,
सुरभित भए निकुंज, झूमती मधुपावलियां।
चटके सुमन गुलाब, चौंचि कोइल ने खोली,
फूटे पात पलास, अंक में घोली रोली।
मंद-मंद गति झूमती, आबति चली बयार,
खसबोइन के खुल गए, मानहुं कहूं किबार।
बगरि सौरभ रह्‌यो॥"

"जीर्न पत्र झरि गए, पतित ह्‌वै गए पुराने,
नवयुग के आगमन, नए अंकुर हरियाने।
तरु-तरु पल्लव नए, नई कोंपल उठि आईं,
डार-डार पै चारु, चिरैयां चहकत छाईं।
ताल-तमालन पै नई रही लहर छबि छाय,
तरुन-अरुन की किरन हू, सुबरन रही बिछाय।
रंगीली भूमि पै।।"

यहां व्यासजी की भाषा पर खड़ीबोली का प्रभाव स्पष्ट रूप से परिलक्षित है। इस रचना के अंत में कवि ने अंग्रेज कवि शैली की भांति अचानक व्यक्तिगत होकर देश-कारुण्य को स्वर दिया है-

"फूंकौ फूल पलास के आज ज्वाल अंगार,
यह मदनोत्सव है नहीं, अरे मरन त्यौहार।
अभागे देस को।"
ब्रजमाधुरी के इस विकास को हास्य-व्यंग्य तक पहुंचना था और व्यासजी की प्रसिद्धि हास्य-कवि के रूप में ही होनी थी, अतः इस प्रवृत्ति का बीजारोपण ब्रजभाषा की कविता के सृजन क्षणों में ही होगया था।
हिन्दी-हास्य में पत्नीवाद के प्रवर्तक व्यासजी ने हर जगह किसी न किसी रूप में पत्नी का स्मरण अवश्य किया है। देखिए इस छंद में 'विधि-हरि-हर' की भी आकांक्षा नहीं रही है-

भोजन में भात होय, घी सौं मुलाकात होय,
दही-बूरौ साथ होय, दार अरहर की।
हरौ कछु साग होय, चटनी की लाग होय,
फूले-फूले फुलका, परोसैं जाए घर की।
'व्यास' कवि कहैं रबड़ी जो मिल जाए कहुं,
फेरि हमैं चाहना न विधि-हरि-हर की।
योजना बनाओ तो जामें खीर घुटै,
पूरी कौन खाय ? बात मालपुआ तर की।"

ब्रजभाषा के आधुनिक कवियों में पं. हृषीकेश चतुर्वेदी तथा थानसिंह शर्मा 'सुभाषी' के अतिरिक्त केवल व्यासजी ही ऐसे कवि हैं, जिनका गंभीर एवं हास्य दोनों ही विषयों पर समान अधिकार है।
व्यासजी का यह भाव-चक्र ब्रजभाषा की परिधि में ही चला है, अतः उन्होंने अपनी भाषा के माधुर्य एवं लालित्य के प्रकाशन में कोई कसर नहीं छोड़ी है। वह ब्रजभाषा के संबंध में कहते हैं-


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