"ये अनुराग के रंग रंगी,
रसखान खरी रसखान की भाषा।
यामैं घुरी मिसुरी मधुरी,
यह गोपिन के अधरान की भाषा।
को सरि याकी करै कवि 'व्यास'
ये भाव भरे अखरान की भाषा।

बोरत भक्ति, निचोरत ज्ञानहि,
गोबिंद के गुन-गान की भाषा।"
"कंकड़ हूं यहां कांकुरी ह्वै रहै,
शंकर हूं की लगै यहां तारी।
झूंठे लगैं यहां वेद-पुरान,
अनूठे लगैं रसिया, रस-गारी।
रोयबौ-झींकिबौ यामैं नहीं,
ये उछाह की फूलि रही फुलवारी।
ये ब्रज की कविता है किधौं,
ब्रजचंद नैं चांदनी आपु पसारी।"
आगे चलकर व्यासजी ने खड़ीबोली का दामन थाम लिया, किन्तु उनके संस्कार के पीछे की ओर ही देखते हैं-
"कविता में जब ते बिसरि ब्रजभाषा गई,
सन्तन की सेवा गई, देवन की बंदना।
गुरुन की रीति गई, जीवन तैं प्रीति गई,
रस की प्रतीति गई, अर्थ रहे छंद ना।
रहे हैं रहस्य, छाया, हाला, प्याला-हाय-हूय,
महिषी की नन्दिनी औ गर्दभ के नंदना।
मानस-मराल गए, सुक-पिक ख्याल गए,
दिन में ही रैन है, चकोर चितै चन्द ना।"
विषय की विविधता व्यासजी के ब्रजभाषा काव्य का सर्वप्रथम गुण है। व्यासजी में सामयिक विषयों पर भी सशक्त शैली में रचना करने की अपूर्व क्षमता है। उन्होंने काल और परिस्थिति के अनुरूप स्वयं को मोड़ा है। भूमिदान के संबंध में कुछ पंक्तियां पठनीय हैं-
"ऐसी गति पेखी मैं, विनोबा के पगन माहिं,
जानैं मति पंगु कीन्हीं गरुड़ गुमान की।
रावन भुजान की न, राघव के बान की न,
गति हनुमान तैं बड़ी है भूमिदान की।"
इस प्रकार व्यासजी ने युगीन समस्याओं को भी अपने काव्य में स्थान दिया है। उनका ब्रजभाषा-काव्य नवीन और प्राचीन विषयों को जोड़ने वाला पुष्ट सेतु है।
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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