मैंने धीमे-धीमे अपना परिचय देना प्रारंभ किया। उन्होंने मेरी ओर गहरी दृष्टि से देखा, फिर सामने वाली खाली कुर्सी की ओर इशारा करके बोले, ''बैठ जाओ।'' बोले, ''कुछ सुनाओ'' मैंने अपने आपको भीतर से काफी मजबूत किया और कविता-पाठ प्रारंभ कर दिया। संध्या होगई। बोले, ''चलो, मेरे साथ।'' उस समय भागीरथ पैलेस में दूसरी मंजिल पर व्यासजी रहते थे। घर ले गए। इत्तफाक से उस दिन बिजली भी गायब थी।
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ऊपर से टार्च मंगवाई और ऊपर तक ले गए। इस बीच में उन्होंने जिन-जिन कवियों को लालकिले से प्रसिद्धि दिलवाई उन सबकी चर्चा मुझसे की। इससे अधिक और कुछ नहीं कहा। जब मैं चलने लगा तो मुझसे बोले,'' तुम्हें मुझे रोजाना मिलना है।'' उस समय कनाट प्लेस के मध्य में कम्युनिकेशन बिल्डिंग हुआ करती थी, जिसमें दिल्ली प्रदेश हिन्दी साहित्य सम्मेलन का कार्यालय था। मैं प्रतिदिन अपनी स्कूल की ड्यूटी समाप्त करते ही सीधा सम्मेलन-कार्यालय पहुंच जाया करता था। गुरुदेव मसनद लगाए बैठे हुए थे। चारों ओर उनके भक्त, जिनकी कोई सीमा नहीं और शिष्य-समूह उन्हें घेरे रहता था। मेरे जाते ही वे सबसे अपनी दृष्टि और ध्यान हटा देते थे। ''आगया रे संतोष, इधर आ मेरे पास बैठ। सुना, क्या लिखा है ?''
यह गुरुदेव की ही प्रेरणा और स्नेह का प्रतिफल था कि उन दिनों मैं कई-कई गीत लिखता था। गुरुदेव सुनकर बड़े प्रसन्न होते थे और सब चले जाते थे तो उन गीतों की भाषा और व्याकरण को अपने हाथों से ठीक किया करते थे। मेरे जीवन में बहुत से व्यक्ति आए हैं, लेकिन जो मस्ती, जो जीवट, जो जीने का अपनापन, जो गद्य और पद्य दोनों का ही लिखने का अपना अंदाज मैंने अपने गुरुदेव श्री व्यासजी में देखा, वह आज तक किसी व्यक्ति में नहीं दिखा। एक अजीब आकर्षण रहा है उनमें। चाहे कोई किसी भी राजनैतिक पार्टी का बड़े से बड़ा नेता रहा हो, उनके समक्ष आते ही बौना हो जाता था। जब लालकिले में सबसे पहले मुझे उन्होंने खड़ा किया उस समय के धुरंधर कवियों के सामने पहली बार में ही प्रथम कवि के रूप में ही कविता-पाठ के लिए उपस्थित कर दिया। धक-धक करते हृदय से मैंने कविता-पाठ प्रारंभ किया। प्रभु और गुरुदेव की कृपा से पहली ही कविता पर 'वन्स मोर' 'वन्स मोर' की आवाजें उठने लगीं। गुरुदेव ने मुझे इशारे से समझा दिया कि अब बैठ जाओ। उस समय के लालकिले का कवि-सम्मेलन आज के लालकिले के कवि-सम्मेलन जैसा नहीं था। बाकायदा टिकट लगता था। जिस प्रकार क्रिकेट के टेस्ट मैच के खिलाड़ियों को छांटा जाता है, उसी प्रकार कवियों का चयन होता था। सारे वर्ष व्यासजी नई प्रतिभाओं की खोज में रहा करते थे और जिसमें वे प्रबल प्रतिभा देखते थे उसे निश्चित रूप से लालकिले में बुलाकर स्थान दिलाया करते थे। मैंने यहां तक देखा है कि लोग लालकिले से हूट होकर गए और अपने नगर में पहुंच कर पोस्टर छपवाए कि आपके कवि लालकिला रिटर्न हैं। व्यासजी का लालकिले कवि-सम्मेलन में प्रचार करने का ढंग भी अलग रहा। वे तीन-चार नाम बहुत मोटे-मोटे अक्षरों में छपवाते थे और बाकी सब कवियों के छोटे-छोटे अक्षरों में।
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