मेरा नाम हमेशा मोटे अक्षरों में जाता था और उसके साथ में एक विशेषण होता था जो किसी अन्य कवि के साथ नहीं होता था, वह था 'आपका लाड़ला कवि संतोष-आनंद'। मेरा घर का दिया हुआ नाम है 'संतोषानंद'। गुरुदेव एक दिन सोचते-सोचते बोले, ''रे संतोष। ये संतोषानंद कुछ स्वामियों जैसा नाम लगता है। आज से तेरा नाम है 'संतोष- आनंद।'' तभी से 'संतोषानंद', 'संतोष-आनंद' बन गया।
समय अपनी गति से चलता रहा। सन् 65 तक मैं अपनी बहिन के यहां रहा। फिर गुरुदेव मुझसे बोले कि तू अब आकर मेरे पास रह। मैं किशनगंज छोड़कर भागीरथ पैलेस गुरुदेव और माताजी के चरणों में जा बसा। माताजी और गुरुदेव ने मुझे जो स्नेह दिया उसकी मैं व्याख्या नहीं कर पाऊंगा। ये शब्द लिखते हुए मेरी आंखों में निश्चित रूप से अश्रु अपनी कुछ बात कहना चाहते हैं। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि मेरे जन्म के पिता श्री अमरसिंह और माता श्रीमती कलावती रहे, लेकिन कर्म और धर्म के माता-पिता गुरुदेव पंडित गोपालप्रसाद व्यासजी और माताजी श्रीमती अशर्फी देवी ही रहे हैं।
उस समय जो गोविंद व्यास, पुष्पा व्यास, मधु व्यास, रत्ना व्यास को स्नेह और डांट मिला करती थी, वही सौभाग्य से मुझे भी प्राप्त थी। आज भी कोई गुरुदेव या माताजी के बारे में कुछ हल्की बात कह देगा (तब तो मुझे सहन ही नहीं होती थी) या तो प्राण दे दूंगा या फिर ले लूंगा।
मेरे हृदय में तो गुरुदेव व्यासजी और माताजी सदैव विराजमान हैं ही, मेरे घर के छोटे से मंदिर में भी उनके चित्र की प्राण-प्रतिष्ठा है। जहां प्रतिदिन उनकी, हमारे देवी-देवताओं की तरह ही पूजा की जाती है। आज मैं जो कुछ हूं सिर्फ गुरुदेव व्यासजी की बदौलत हूं। लालकिले के कवि-सम्मेलन का पर्याय कहलवा देना मात्र उन्हीं की क्षमता है। नवभारत टाइम्स जैसे राष्ट्रीय दैनिक समाचार पत्र में मुखपृष्ठ पर, जहां प्रधानमंत्री और राष्ट्रपति के चित्र छपते हैं, अकेले संतोषानंद का कविता-पाठ करते हुए चित्र छपवा देना, यह भी उनकी ही क्षमता है।
फिर मैं फिल्मों में चला गया। मेरा सारा समय अस्त-व्यस्त होगया। गुरुदेव भागीरथ पैलेस छोड़कर गुलमोहर पार्क चले गए। दिल की दूरियां तो पास आती गईं, सड़कों की दूरियां दूर होती चली गईं। इस बीच मेरी दुर्घटित टांग फिर दो बार दुर्घटनाग्रस्त होगई। लेकिन गुरुदेव सदैव मेरे हृदय में रहे। उन्होंने मुझे इच्छाशक्ति का वह मंत्र दिया है, जिसने मुझे बार-बार गिरने पर भी चल पड़ने का साहस दिया है।
दृष्टांत तो इतने हैं कि यदि लिखने बैठूं तो मेरी यह उम्र भी छोटी पड़ जाएगी। मेरे प्रभु, मेरे सिर पर गुरुदेव के चरणों की प्रतिच्छाया सदैव रखना, ताकि मैं जब तक जीवित रहूं, तब तक नई-नई खोज के साथ गीत लिखता रहूं। मैंने अन्य कवियों या गीतकारों की तरह कविताएं एक ही फ्रेम में न तो लिखी हैं और न ही पढ़ी हैं। ये भांति-भांति से लिखने का गुण भी मुझे गुरुदेव श्री व्यासजी ने ही दिया है। याद आते है वे दिन। भागीरथ पैलेस में भोर जगते ही एक ही आवाज उठती थी-''रे, संतोष आ।''
पृष्ठ-3