सामने गुरुदेव पलंग पर बैठ जाते थे और मैं नीचे आसन पर दैनिक 'हिन्दुस्तान' हाथ में ले लेता था। प्रत्येक समाचार की प्रथम पंक्ति पढ़ते ही गुरुदेव मननशील हो उठते थे। जो उनको ठीक लगता था, उस पूरी खबर को मुझसे पढ़वाते थे और जो ठीक नहीं लगता था, कहते, ''छोड़ दे इसे, आगे चल'' यह कोई साधारण बात नहीं है कि व्यक्ति प्रतिदिन 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' जैसा गंभीर और व्यंग्यात्मक लेख रच दे। आज मीडिया के तौर पर दूरदर्शन है, केबल है, आकाशवाणी है, किंतु मेरा विचार है-कि 'नारदजी खबर लाए हैं' जितना कल लोकप्रिय था उतना ही लोकप्रिय आज भी है।
आज जो हिन्दी का प्रचार-प्रसार आपको पूरे भारत में दिखाई देता है, उसमें, मैं दावे के साथ कह सकता हूं, पच्चासी प्रतिशत हाथ मात्र पंडित गोपालप्रसाद व्यासजी का है। बड़े-बड़े राजनेताओं की सच्चाई उजागर करने के लिए होली के अवसर पर 'मूर्ख महासम्मेलन' की कल्पना भी उन्होंने ही की थी। आज दिल्ली में जो 'हिन्दी भवन' अपनी पूरी चमक के साथ खड़ा हुआ है, इसके स्वप्नदृष्टा भी पंडित गोपालप्रसाद व्यास ही हैं। इसके लिए वह मुझसे प्रतिदिन कहा करते थे, ''संतोष, दिल्ली में एक 'हिन्दी भवन' की अति आवश्यकता है।''
दिल्ली में बहुत से मित्र हैं। बहुत से कवि हैं। लेकिन जब भी मुझे कष्ट हुआ है तो सबसे पहले मेरे पास आकर गोविंद व्यास खड़ा हुआ है। यह अलग बात है कि उसके और मेरे विचारों में भिन्नता है, लेकिन इसके बावजूद अभिन्नता है। मैं थोड़ा-बहुत चलने-फिरने लगा हूं। थोड़ा और बहुत चलने-फिरने लगूं तो मेरी कामना है कि मैं फिर वही दस-दस कोस चलूं और गुलमोहर पार्क पहुंचकर अपने गुरुदेव और अपनी माताजी के श्री चरणों को स्पर्श करूं।
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