और चाचाजी हैं कि खाना खाने बैठे और दो-चार लोग आ गए तो आवाज देकर कहेंगे -"अरे भाई, दो-चार थालियां और लगा लाओ।'' अब मेरी मुसीबत। अम्मा कहतीं-''पहले से क्यों नहीं कहते। अब एक दाल और सब्जी.....कोई क्या कहेगा ?'' इतने में चाचाजी की आवाज आ जाती-''तकल्लुफ मत करना, जो भी बना हो जल्दी ले आओ।'' जब कभी बाजार गए और अच्छे आम दीखे तो दस-पन्द्रह सेर आम घर ही ले आएंगे। फिर इस आग्रह के साथ हम सबको खिलाएंगे कि हम सोचते, हे भगवान, यह आम नहीं लाते तो ही अच्छा था। उसके पीछे छिपी उनकी स्नेह-भावना हम थोड़े ही भूल सकते हैं।
दिल्ली में लालकुंए वाला मकान छोड़कर जब हम चांदनी चौक आए, तब वहां सबसे ज्यादा दुःख अगर किसी को हुआ था तो वह था-वहां का हलवाई। कहता था कि खाने वाले तो व्यासजी थे। फिर जब कभी चाचाजी का उधर जाना होता, वह गाढ़ी मलाई वाला दूध पिलाए बिना चाचाजी को नहीं छोड़ता।
जब मैं कॉलेज में आई, तब सुबह का अधिकांश समय कॉलेज जाने की तैयारी में लग जाता। उन दिनों मेरी एक और ड्यूटी थी -चाचाजी को अखबार पढ़कर सुनाना। उनकी आंखों की ज्योति कुछ कम होगई थी और इसीलिए वह स्वयं पढ़ने का काम कम ही करते। सो पलंग पर से ही आवाज़ लगाते-''बेटा, देखना अखबार आया क्या ?'' इसका मतलब होता कि अखबार लेकर आ जाओ और पढ़कर सुनाओ। मुझे कॉलेज जाने की जल्दी होती। होता यह कि शुरू की कुछ खबरें तो मैं धीरे-धीरे पढ़ती और जैसे ही घड़ी की सुई आगे बढ़ती, मेरी पढ़ने की रफ्तार भी तेज़ होती जाती। मेरी इस हरकत से चाचाजी ने मेरा नाम रख दिया-'लबरो'। और अक्सर मुझे इसी नाम से चिढ़ाते।
नाई और मालिश करने वाले भी चाचाजी ने बहुत छांटकर रखे हुए थे। नाई धन्नतर को ही लीजिए। चाचाजी की दाढ़ी बना रहा है और अजीबोगरीब किस्से चालू हैं। कभी-कभी तो एक-एक घंटा तक नाई महाशय की कहानी चलती रहती और चाचाजी बहुत रस ले-लेकर उसका जायका लेते, बल्कि आगे चलकर तो चाचाजी ने यह शर्त ही रख दी कि जब तक वह कोई कहानी नहीं सुनाएगा, तब तक वह उससे हजामत नहीं बनवाएंगे। नाई महाशय से चाचाजी इतने खुश हुए थे कि उसे अपना एक कोट कहानियां सुनाने में पुरस्कारस्वरूप अर्पित कर दिया।
कवि हैं, इसलिए भावुक हैं। उनमें दया-भावना की कमी नहीं। एक बार रात को करीब दो बजे उठे तो देखा कि महरी रामप्यारी (वह गुलाबो के नाम से बहुत ही चिढ़ती थी) सर्दी में कुड़कुड़ा कर सो रही थी। चाचाजी ने फौरन अम्मा को बुलाया और रामप्यारी पर कम्बल डलवाया। उनके इस स्नेहिल और सहज व्यवहार के कारण ही उनका परिवार बहुत विस्तृत होगया। और उस परिवार में ऊंच-नीच, छोटे-बड़े, जात-पांत, धर्म आदि की सीमाएं भी नहीं। एक बार एक मुसलमान बहन से उनका परिचय हुआ। वह दिल्ली में पहली बार आई थीं। अपनी बेटी की तरह चाचाजी ने उनकी सुख-सुविधा का प्रबंध किया। उनके काम में पूरी तरह मदद की। आज वह विश्वविद्यालय में प्राध्यापिका हैं।