उनसे बिलकुल घर का-सा संबंध है। अम्मा उनके यहां खाना नहीं खातीं। लेकिन मैं जानती हूं कि एक दिन वैसा भी हो जाएगा। इस हद तक तो अम्मा बदल गई हैं कि वह बहन हमारे यहां खाना खा जाती हैं।
हास-परिहास तो घर में चलता ही रहता है। और उस परिहास की शिकार अधिकतर होती हैं अम्माजी। चाचाजी की अति-व्यस्तता और इधर-उधर की बातों में उलझे रहना आदि को लेकर अम्माजी कभी-कभी चाचाजी पर (वास्तव में) नाराज़ हो जाती हैं। लेकिन चाचाजी हैं कि अगले ही क्षण धीमे से मुस्कराएंगे, धीरे-धीरे वह मुस्कराहट हंसी में बदल जाएगी और अम्मा का गुस्सा उस हंसी में घुल-मिल जाएगा।
दूध मुझे बिलकुल पसंद नहीं। लेकिन अम्माजी हैं कि पीछे ही पड़ी रहतीं। चाचाजी से कहतीं-''इसे दूध पिला दो तो जानूं !'' चाचाजी बोलते-''अच्छा रही पांच-पांच रुपए की शर्त !'' फिर मैं चाचाजी की लाड़ली भला अम्मा को कैसे जीतने देतीं ! इतना समझौता चाचाजी से जरूर होगया कि अम्माजी से मिलने वाले पांच रुपए मेरे। और एक सांस में सारा दूध पी गई। चाचाजी जीते और अम्माजी खीझीं।
और कभी-कभी अम्माजी को चिढ़ाने के लिए हम बाप-बेटी अंग्रेजी में बातचीत करने लगते। तब अम्मा सोचतीं कि उनके खिलाफ साजिश हो रही है। वह बड़बड़ातीं। इधर हम दोनों उन्हें चिढ़ा हुआ देखकर मजा लेते।
स्मरणशक्ति तो चाचाजी की गजब की थी। कवि-सम्मेलनों में किसी भी कविता की फरमाइश हो, कभी नोट-बुक देखने की जरूरत उन्हें नहीं पड़ी। बचपन में पढ़े अनेक कवित्त-सवैये उन्हें कंठस्थ हैं। कितने ही लोकगीत उन्हें अच्छी तरह याद हैं। अक्सर वह झूले पर बैठ जाते और अलमस्त होकर उन्हें गाते रहते।
एक बार किसी ने चाचाजी को पैसों की माला पहना दी। शनिवार का दिन और चाचाजी हैं कि वह माला पहने घर चले आए। अम्मा बहुत झल्लाईं-''चलो फेंको इसे !'' पर जब गोभी या बैंगन की माला पहनकर घर आते, तब घर में सब्जी की कई दिन छुट्टी हो जाती। और अब तो अम्मा ने कह रखा है कि जो भी इनके साथ रहे, इन्हें पहनाई गई गुलाब की माला जरूर घर ले आए, क्योंकि वह गुलकन्द बनाने में लगी हैं। चाचाजी भी वहमी खूब हैं। कभी किसी ने घर में कह दिया कि जुकाम हो रहा है तो बस चाचाजी को फौरन छींकें आनी शुरू हो जाती हैं। फिर कहेंगे-''कर दिया न मुझे भी जुकाम !'' अगर हममें से किसी को बुखार आगया तो फल और दवा लाने में चाचाजी कुछ अधिक चुस्त हो जाते हैं, लेकिन मरीज के पास बैठने में सुस्त।
लेकिन हास्य-रस के इस बादशाह की आंखों में आंसू भी मैंने देखे थे एक बार, और वह दिन था विवाह के बाद मेरी विदाई का। सुबह तड़के से ही वह काम-काज में लगे रहे। ऐन विदाई के समय वह चुपचाप किसी अन्य कमरे में चले गए।
पर मैं उनसे बिना मिले कैसे चली जाती। उन्हें बुलाया गया। मैंने चरण-स्पर्श किया और तब तो ममता और