चाचाजी

( श्रीमती पुष्पा उपाध्याय )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

वात्सल्य का निर्झर उनकी आंखों से बह निकला। लेकिन तब भी अपनी चिर-परिचित मुस्कान के साथ मुझे समझा रहे थे-''इस तरह नहीं रोते, बेटी!''
जब भारत सरकार ने चाचाजी को पद्मश्री की उपाधि से सम्मानित किया और संभवतः वह पहले हिन्दी-पत्रकार थे, जिन्हें यह सम्मान मिला। स्वागत-समारोहों और अभिनन्दनों का तांता लग गया। पिताजी के जन्म-स्थान परासौली (मोहम्मदपुर) में हुए स्वागत जुलूस में हजारों की तादाद में ग्रामीण भाइयों एवं अन्य स्नेहियों ने भाग लिया। लेकिन मुझे विशेष रूप से याद आता है मथुरा में हुआ स्वागत समारोह। समारोह से लौटते समय पानवाले की दुकान के निकट चौबे मित्रों ने चाचाजी को कलेजे से चिपटा लिया। उनमें से एक गदगद स्वर में बोला-''अरे भैया गुपाल, तू तो ब्रज के गोपन कूं बिल्कुल बिसराय गयौ। हमारौ चित्त तो अखबारन में पढ़िके बड़ौ खुश भयौ ?'' और उसने पान की एक गिलौरी चाचाजी के मुंह में ठूंस दी।
हर स्थिति का एक खास पहलू होता है। संभवतः चाचाजी का ऐसा ही मानना है। मेरे बड़े श्वसुर श्रद्धेय हरिभाऊजी उपाध्याय ने कुछ दिनों पहले राजस्थान के शिक्षा मंत्री पद से त्यागपत्र दे दिया। हंसते हुए चाचाजी कहते हैं-''चलो अच्छा हुआ ! हमारा भी मिथ्या गर्व कि हम मंत्रीजी के समधी हैं, जाता रहेगा।''
मेरे श्वसुर श्री मार्त्तण्डजी उपाध्याय से तो उनका मजाक चलता ही रहता। दोनों घंटों टेलीफोन मिलाए बैठे हैं और चुहलबाजी चलती रहती है। मुझसे कहने लगे-''पुष्पा, जरा अपनी सास की बातें तो बताना। कविता पूरी करनी है। फिर तेरे श्वसुर से अनुमति भी लेनी है, जनता को सुनाने के लिए।''
आज जब मैं चाचाजी पर इतनी दूर (मुंबई) से उनके संबंध में कुछ पंक्तियां लिखने बैठी, तो कितनी छोटी-बड़ी स्मृतियां मानस में आती हैं। इस बीच में मुझे एक घटना विशेष का ध्यान आ रहा है। ग्लूकोमा के कारण उनकी आंखें कुछ खराब होगईं। ऑपरेशन कराया। कुछ समय बाद डाक्टर ने पट्टी खोली, तब मैं उनके पास ही बैठी थी। उन्होंने एक कविता मुझे लिखाई-
"आई है दृष्टि लौट, कह रही-बधाई 'व्यास',
आगे से जीवन में आंख खोल चलना तुम।!
सागर-से रहना तरंगमान, धीर, शांत,
छलना से बचना, किसी को न छलना तुम !
बढ़ना अवश्य, पर औरों को दे के छांह,
चलना, किसी को कदापि न कुचलना तुम !
औरों को बदलने से पहले महानुभाव,
हो सके तो नेताजी, खुद को बदलना तुम !"
इस प्रकार चाचाजी अपनी आलोचना करने से भी नहीं चूकते थे। शायद उनका जीवन-मंत्र भी यही था कि जहां भी विषमता या आडम्बर है, उसको नज़रअंदाज नहीं करना चाहिए। फिर चाहे वह अपने में हो या अपनों में। गैर तो उनके लिए कोई था ही नहीं।


('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन्‌ 1966)


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