वह मुझसे मिले बिना चले गए !

( डॉ0 रत्नावली कौशिक )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

उस समय के एक बड़े नेता ने कांग्रेस वर्किंग कमेटी में शिकायत की कि मूर्ख महासम्मेलन में नेताओं को खुलेआम बदनाम किया जाता है। पर चाचाजी ने अगले साल कुछ ऐसा चक्कर चलाया कि उस नेता को ही मूर्ख महासम्मेलन का सभापति बनाकर दिल्ली में खड़ा कर दिया और लाखों की भीड़ के सामने घोषणा कर दी-''दोस्तो, मूर्ख महासम्मेलन का दुश्मन आज आपके सामने हाज़िर है, बोलो क्या सलूक किया जाए ?''
भागीरथ पैलेस छोड़कर जब चाचाजी गुलमोहर पार्क आए थे, यह आयोजन हमेशा के लिए खत्म होगया। आखिर इस पैमाने पर ऐसी सूझ-बूझ वाला आयोजन हर किसी के वश की बात नहीं। मेरे पिता बहुत हठी, बड़े जिद्दी किस्म के व्यक्ति थे। एक बार जो जिद ठान ली तो बस ठान ली। उनके संपूर्ण व्यक्तित्व और कृतित्व में यह जिद समाई है। वरना क्या पोद्दार अभिनंदन ग्रंथ, राजर्षि टंडन अभिनंदन ग्रंथ, गांधी हिन्दी दर्शन, ब्रज-विभव और स्वतंत्रता रजत जयंती ग्रंथ जैसे विशाल ग्रंथ जो हिन्दी जगत के लिए मील का पत्थर हैं, का प्रकाशन संभव हो पाता। विशेषज्ञों का मानना है कि अगर इनमें किसी भी तरह की संबंधित जानकारी न मिल पाए तो यह शोध का विषय होनी चाहिए। यह विश्वास ही नहीं होता कि यह मात्र एक व्यक्ति का काम हो सकता है। एक बेटी के रूप में जब मैं अपने पिता का काम देखती हूं तो सोचती हूं, बिना आंखों के कैसे किया होगा चाचाजी ने ये काम ? इतने सारे लोगों को, इतने वृहद स्तर पर इकट्ठा करना। उनसे लिखवाना, एक-एक निबंध को सुनना, चुनना, संपादन करना। बिना दिव्यदृष्टि और मां सरस्वती के आशीर्वाद के संभव नहीं।
चाचाजी में गजब की संगठन क्षमता थी। वे जाने कैसे और कितने सारे लोगों को अपने साथ सहज ही जोड़ लेते थे। वे जानते थे, किस आदमी में क्या क्षमता है और उसे कहां तक ले जाकर, कितना काम करा सकते हैं। 'हिन्दी भवन' से बढ़कर इसका उदाहरण क्या हो सकता है। देश की राजधानी में उन्होंने अपने और अपने से जुड़े लोगों के बल पर पांच मंजिला हिन्दी भवन का निर्माण करवा डाला। आज जब लोग केवल एक घर बनाने का सामर्थ्य नहीं जुटा पाते, मेरे पिता ने हिन्दी के लिए पांच मंजिल का यह भवन बना दिया। जिस समय इस भवन की नींव डाली जा रही थी, मेरे पिता 75वें वर्ष में प्रवेश कर चुके थे। आंखें लगभग जा चुकी थीं। कान सिर्फ कुछ जरूरी और मतलब की बात सुनना ही पसंद करते थे। हिन्दी के नाम पर कोई सरकारी सहायता नहीं। सरकार किसी भी दल की क्यों न हों, जाने क्यों अपनी ही भाषा के प्रचार-प्रसार के काम से शर्माती और झिझकती है। करोड़ों रुपयों की लागत से बने इस भवन की राशि को मेरे पिता ने लोगों के सामने झोली फैलाकर ही एकत्र किया था। जब तक प्रतिदिन एक निश्चित राशि इकट्ठी नहीं हो जाती, वे खाना नहीं खाते थे। यह 'हिन्दी भवन' उनके लिए ईंट-पत्थर की इमारत नहीं, बल्कि उनका वह सपना था, जो उन्होंने हिन्दी के विकास के लिए देखा था। उनके लिए यह राष्ट्रीयता का वह मन्दिर है जिसमें भारत की वाग्देवी राष्ट्रभाषा हिन्दी की प्राण-प्रतिष्ठा होगी।




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