वह मुझसे मिले बिना चले गए !

( डॉ0 रत्नावली कौशिक )   

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

उनका यह मानना था कि हिन्दी किसी एक जाति, एक प्रदेश या मात्र हिन्दी प्रदेशों के बल पर नहीं चलेगी। हमें सभी भाषाओं, वर्गों और विचारधाराओं को हिन्दी के साथ जोड़ना होगा। हिन्दी के लिए कुछ ऐसा करना पड़ेगा जिससे हमारे हिन्दीतर भाषाभाषी भाई हिन्दी की ओर स्वयं आकर्षित हों। हमारे साहित्यकारों को ऐसा लिखना पड़ेगा कि जिसके लिए लोग हिन्दी सीखने के लिए लालायित हो जाएं।
एक ओर इतना गंभीर काम और चिंतन। दूसरी ओर हास्यरसावतार और हास्यसम्राट। चाचाजी ने हास्यरस लिखा ही नहीं, बल्कि जिया भी। हास्य उनके जीवन का अंग बन गया था। इस हथियार के माध्यम से उन्होंने घर-परिवार की ही नहीं जीवन की विषम समस्याओं का भी चुटकी बजाकर समाधान कर लिया। समाज और साहित्य की ही नहीं, घर और छह बच्चों की जिम्मेदारियों को भी उन्होंने बखूबी निभाया। दर्जनों किताबें लिख डालीं। घर और मन्दिर का निर्माण किया। प्रसिद्धि और पुरस्कार सभी कुछ तो इस हास्यरस के माध्यम से चाचाजी ने हासिल किए। उन्हें रोने, चीखने, चिल्लाने वाले लोग बिलकुल पसंद नहीं थे। वे बतरसी अवश्य थे, पर महज बात बनाने वालों से दूर ही रहते थे।
मेरे पिता का व्यक्तित्व भी अदभुत था। सफेद-बुर्राक खादी का धोती-कुरता, सिर पर टोपी। मुंह में पान-गिलौरी। इत्र-फुलेल। हाथ में छड़ी। आंखों पर चश्मा। खाने-खिलाने का जबर्दस्त शौक। रबड़ी, खीर और खुरचन के शौकीन मेरे पिता तर माल ही खाना-खिलाना पसंद करते थे। दाल में ऊपर तक घी न हो तो वह थाली में से दाल की कटोरी हटा देते थे। स्मरणशक्ति ऐसी कि कभी कोई बात नहीं भूले। जिस व्यक्ति से एकबार मिल लिए उसका नाम कभी नहीं भूले। कभी कोई कविता नोटबुक से देखकर नहीं पढ़ी। बचपन में पढ़ी-सुनी बातें, छंद, कवित्त और मुहावरे उन्हें 90 वर्ष की आयु में भी ज्यों के त्यों याद थे। हम बच्चे कभी उनसे किसी विषय पर कुछ लिखवाना चाहते तो उन्हें एक मिनट भी सोचने की जरूरत नहीं पड़ती थी। तत्काल ही वह कहते-लिखो। ईश्वर की उन पर विशेष कृपा थी। उन्हें शिष्यों से लेकर सेवकों तक की कभी कमी नहीं पड़ी। उनका कोई काम आर्थिक या किसी दूसरे कारण से कभी नहीं रुका। जो चाहा उसे प्राप्त किया। चुहलबाजी ऐसी कि यार-दोस्तों और रिश्तेदार ही नहीं, चाचाजी ने समधियों और लड़कियों के ससुराल वालों को भी नहीं बख्शा। एक बार मेरी सासुमां मेरे पिता से अपने कौशिक होने की गरिमा का बखान कर रही थीं। पिताजी को यह कहां बर्दाश्त हो सकता था। फौरन बोले- हमने तो शब्दकोश में कौशिक का मतलब 'उल्लू' पढ़ा है। महीनों मुझे चाचाजी के इस हास-परिहास के परिणाम भुगतने पड़े।







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