ऐसे थे मेरे पिता पं. गोपालप्रसाद व्यास। यह लेख अधूरा रह जाएगा अगर आज मैं अपनी मां को याद न करूं। मां, चाचाजी के जीवन में यश, धन, साहित्य, संतान, सुख सभी कुछ तो लेकर आईं थीं। चाचाजी को आनंदमूर्ति बनाने वाली मेरी मां ही थीं। चाचाजी का लेखन उनके बिना अधूरा है। वही तो मेरे पिता की पत्नी, प्रेमिका और प्रेरणा थीं। वे गईं तो मानों चाचाजी के लिए सब कुछ चला गया। सात ही महीनों के भीतर वे स्वयं भी।
मैं उनकी सबसे छोटी बेटी उनकी क्या-क्या बातें भूलने की कोशिश करूं ? विश्वास नहीं होता कि 'चाचाजी' नहीं रहे। हम बच्चे अपने पिता को 'चाई' या 'चाचाजी' के संबोधन से ही पुकारते थे। मेरे कानों में उनकी हंसी, उनके ठहाके गूंज रहे हैं और आंखों के सामने हर मुश्किल, हर तकलीफ को धता बताकर आगे चलने वाला उनका कर्मयोगी स्वरूप। अपने पिता जैसी कर्मठता, एकाग्रचित्तता और विपरीत परिस्थितियों में जीवन जीने की कला मैंने कहीं नहीं देखी। न ही वे जीवन की किसी स्थिति-परिस्थिति से थके, घबराए, परेशान हुए और न ही अपने आस-पास के लोगों को होने दिया।
और अंत में चाचाजी से एक शिकायत भी। न जाने क्यों मुझे हमेशा लगता था कि वे अपनी बेटियों को प्यार नहीं करते। सिर्फ बेटों को करते हैं। बेटियों में बड़ी जीजी को ही उनका प्यार मिलता था। यह शिकायत अब यकीन में बदल गई है, क्योंकि उन्होंने मेरे आने का भी इंतजार नहीं किया। मैं भागती-दौड़ती लंदन से आई और वह मुझसे मिले बिना चले गए।
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(पत्रिका 'आजकल' से)