व्यासजी का गद्य और पद्य दोनों पर ही समान अधिकार है। उन्होंने कोई एक दर्जन से कुछ अधिक ही पुस्तकें लिखी हैं, किन्तु प्रधान रूप से व्यासजी व्यंग्य-विनोद-साहित्य के एक सिद्धहस्त कलाकार हैं। किन्तु ऐसे विनोदी अथवा व्यंग्यकार नहीं कि देश के संक्रामक काल में भी वह अपनी वाणी और लेखनी से विनोदी साहित्य उड़ेंलते रहें।
पिछले दिनों जब मातृभूमि पर चीन का बर्बर आक्रमण हुआ तो व्यासजी की विनोदी लेखनी ने विनोद के स्थान पर आग उगलना आरंभ किया। एक ओर व्यासजी की लेखनी लोगों को हंसाने, दुलराने और बहलाने में समर्थ है तो दूसरी ओर मातृभूमि के बलिपथ पर बलिदानी प्रेरणा भरा ज्वालामुखी का लावा उगलने में भी। इस प्रकार व्यासजी स्वयं एक देशभक्त तो हैं ही, वह देशभक्ति के प्रेरणा-स्रोत भी हैं, एक सच्चे सैनिक और सेनापति की भांति।
यह वर्ष व्यासजी की स्वर्णजयंती का वर्ष है और उनके साथी, मित्र और शुभचिंतक उन्हें एक अभिनंदन-पुस्तिका भेंट कर रहे हैं। यह एक बहुत ही स्तुत्य और उपयुक्त निर्णय हुआ है। व्यासजी की सेवाएं और उनका व्यक्तित्व इसके उपयुक्त है। मैं इस अनुष्ठान में अपनी हार्दिक शुभकामनाएं अर्पित करता हूं और भगवान से प्रार्थना करता हूं कि वह श्री व्यासजी को स्वस्थ एवं दीर्घजीवी करे, जिसमें वह पूर्ववत अपने मेधावी व्यक्ति और व्यक्तित्व रूप से देश, समाज, साहित्य और संस्कृति की सेवा करते रहें।
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)