औटपाई गुपाल

(बनारसीदास चतुर्वेदी)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

मैंने व्यासजी से कहा कि नवीनजी की कविता का जवाब देना है। व्यासजी तुरंत मेरी रक्षा के लिए उद्यत होगए और उन्होंने नवीन पर बड़ी मधुर चोट की, जिसमें उन्हें ''छैला टेढ़ी टोपी वारे' कहकर संबोधित किया गया था। अपनी किसी एक कविता में व्यासजी ने 'टीकमगढ़ी' प्रचार का भी उल्लेख किया है। जब मैंने एक मीटिंग में, जो श्रद्धेय टंडनजी का अभिनंदन करने के लिए बुलाई गई थी, यह निवेदन किया कि दिल्ली में बनने वाले हिन्दी-भवन का नाम 'पुरुषोत्तम हिन्दी भवन' होना चाहिए, तब व्यासजी ने उसका हार्दिक समर्थन किया और आगे चलकर अपने साथी-संगियों से भी मेरे इस प्रस्ताव को स्वीकृत करा दिया तथा अब 'श्री पुरुषोत्तम हिन्दी भवन न्यास' (ट्रस्ट) नाम से संस्था का संगठन कर लिया है। प्रधानमंत्री श्री लालबहादुर शास्त्री उसके अध्यक्ष हैं और व्यासजी उसके मंत्री।

पिछले 20-22 वर्षों में राजधानी में राष्ट्रभाषा के लिए जो महान कार्य हुआ, उसमें व्यासजी का ज़बरदस्त भाग है। ब्रजवासियों से वह ब्रजभाषा में ही बोलते हैं और पत्र भी यथासंभव ब्रजभाषा में ही लिखते हैं। केन्द्रीय मंत्री
श्री राजबहादुर भी हमसे ब्रजभाषा में ही बोलते हैं और पत्र-व्यवहार करते रहे हैं।

व्यासजी के कितने ही पत्र मेरे पास सुरक्षित हैं। उन पत्रों में सबसे महत्वपूर्ण है वह पत्र, जो उन्होंने छिपैटी मुहल्ला, इटावे की होली की पड़वा देखने के बाद लिखा था ! उस पत्र को हमने विशेष रूप से सुरक्षित कर रखा है और उसे हम प्रेस को तब भेजेंगे, जब हमारा एक पैर कब्र में होगा। उस महत्त्वपूर्ण पत्र को डाकखाने में डालकर हम धड़ामसैनी कब्र में कूद पड़ेंगे, फिर भले ही धर्मप्राण चौबे लोग हमें वहां से निकाल कर 'कांधे चले चढ़ि चार जना के' इस उक्ति को चरितार्थ करते हुए जमना मैया की शरण में ले जाएं।

व्यासजी ने लाखों ही व्यक्तियों का मनोरंजन किया है और उनकी विनोदपूर्ण रचनाओं के सहस्त्रों ही प्रशंसक है। जिस-जिस पत्र में वह लिखते हैं, उसकी लोकप्रियता बढ़ जाती है। कवि-सम्मेलनों में उनकी बड़ी पूंछ (!) होती है और साहित्य-गोष्ठियों पर तो वह छा जाते हैं ! यदि व्यासजी के हास्य रस संबंधी सभी लेखों का संग्रह किया जाए, तो वह कई जिल्दों में आएगा। हमें तो इस बात से आश्चर्य है कि व्यासजी इतना अधिक लिख कैसे सकते हैं ! कोई 'गणेश' जैसा लेखक भी उनके पास नहीं !

 

 

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