फिर भी व्यासजी के कई ग्रंथ प्रकाशित हो चुके हैं और यदि वह संस्थाओं के चक्कर में न फंसे होते तो और भी महत्वपूर्ण साहित्य-सेवा कर सकते थे। लाला श्री निवासदास पर उनका शोध-ग्रंथ अब भी अधूरा और अप्रकाशित है।
सरकार द्वारा दी जाने वाली उपाधियों के बारे में हमारे हृदय में विशेष सम्मान नहीं, फिर भी जब व्यासजी को 'पद्मश्री' दी गई, तब तो हमें हार्दिक हर्ष हुआ, क्योंकि यह सर्वथा योग्य व्यक्ति का सम्मान था। उस समय हमने लिखा था- .jpg)
''श्रद्धेय लालबहादुर शास्त्री की सरकार ने एक भोले-भाले ब्रजवासी को ठग लिया, क्योंकि व्यासजी तो उच्चतर उपाधि के अधिकारी हैं।''
व्यासजी सिर्फ दूसरों का ही मज़ाक नहीं उड़ाते, अपना मज़ाक उड़ाने में भी उन्हें मज़ा आता है।
दिल्ली छोड़े हुए हमें साल-भर से अधिक होगया। इस बीच हमें राजधानी के तत्कालीन जीवन की कई बार याद आई है। स्वर्गीय दद्दा मैथिलीशरणजी के वे मधुर व्यंग्य अब कहां सुनने को मिलेंगे ? और बंधुवर नवीनजी का भ्रातृभाव तो सदा के लिए चला गया। यद्यपि दिल्ली में अनेक ऐसे व्यक्ति विद्यमान हैं, जो मुझ पर कृपाभाव रखते हैं, तथापि दिल्ली पहुंचने के लिए मेरे मन में कोई विशेष उत्साह नहीं। फिर भी भूले-भटके कभी दिल्ली का स्मरण हो आता है तो नवीनजी के 'औटपाई' व्यासजी को मैं नहीं भूल पाता-
''याद मोहि आवें वे झगरे गुपाल के''
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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