दूसरा रूप उनका हिन्दी के कर्मठ सेवक का है। उन्होंने हिन्दी के आंदोलन में सक्रिय योगदान किया है। इसका पता देश के सभी हिन्दी में रुचि रखने वाले जागरूक लोगों को है। यदि और सब छोड़ दिया जाए तो विधान में भाषा-नियम के परिवर्तन के समय उन्होंने जो सम्मेलन दिल्ली में बुलाया था और बड़े-छोटे सभी हिन्दी-प्रेमियों ने जहां एक स्वर से हिन्दी के संबंध में अपनी सम्मति प्रकट की थी वह ऐतिहासिक घटना है। वह उन्हीं के प्रयत्नों का फल है। व्यासजी में लोगों को एकत्र करने का जादू है।
गत वर्ष साहित्य के मूल्यांकन पर उन्होंने जो गोष्ठी की थी उसकी सफलता भी हम जानते हैं। अभी उन्होंने वीररस का कवि-सम्मेलन दिल्ली में किया था, उसकी सफलता इसी से आंकी जा सकती है कि कई लाख रुपये उससे आय हुई और वह सुरक्षाकोष में दी गई। लाल किले में वह हर साल कवि-सम्मेलन कराते हैं। देशभर के कवियों को बुलाते हैं। साहित्य का अच्छा-खासा जमघट हो जाता है। यह भी राजधानी से हिन्दी-प्रचार का काम ही है। दिल्ली प्रादेशिक हिन्दी साहित्य सम्मेलन के कार्यों में वह सतत परिश्रम करते रहते हैं और उसे बड़ी सजीव संस्था बना रखा है।
व्यासजी कुशल पत्रकार हैं और 'दैनिक हिन्दुस्तान' में बहुत दिनों से संपादकीय विभाग में काम कर रहे हैं। उनका स्थान हिन्दी के अनुभवी पत्रकारों में है।
सरकार ने व्यासजी को 'पद्मश्री' देकर उनकी सेवाओं को मान्यता दी है, किन्तु वह तो साधारण बात है। उनको हिन्दी के सभी साहित्यकारों ने मान्यता अपने हृदय में दी है। इसका कारण उनका स्नेह है, उनकी उदारता है और है उनकी हिन्दी के प्रति निष्ठा।
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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