हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा

(विष्णु प्रभाकर)  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

मेरे और व्यासजी के संबंधों की एक लंबी कहानी है। व्यासजी ने दिल्ली के हिन्दी साहित्य सम्मेलन में नए प्राण फूंके और सम्मेलन के माध्यम से दिल्ली में हिन्दी का बिगुल बजा दिया। व्यासजी की कर्मठता, परिश्रम-क्षमता से ही आज दिल्लीवालों को 'हिन्दी भवन' प्राप्त हुआ है।

हास्य और व्यंग्य के क्षेत्र में व्यासजी ने नए कीर्तिमान स्थापित किए। हास्य-व्यंग्य में जो फूहड़पन चला आ रहा था, उसे व्यासजी ने शिष्टता, शालीनता एवं साहित्यिक महत्व प्रदान किया। उनके द्वारा ही हिन्दी में व्यंग्य-साहित्य की प्रतिष्ठा हुई।
बहुत कुछ है व्यासजी के बारे में कहने के लिए मेरे पास। मेरे उनके साथ पारिवारिक संबंध हैं, पर उनकी याद को हृदय में संजोए हुए हम लोग अपनी-अपनी डगर पर चल रहे हैं। चौरासी-पचासी वर्ष की अवस्था और शारीरिक बाधाओं के बावजूद व्यासजी में आज भी युवकों जैसा उत्साह और कर्मठता विद्यमान है। वह आज भी निरंतर लेखन में और हिन्दी भवन के कार्यों में सक्रिय हैं।
व्यासजी ने हिन्दी के लिए कितना काम किया है, इसका लेखा-जोखा देने के लिए एक ग्रंथ की आवश्यकता होगी। मैं तो इतना ही कह सकता हूं कि उन्होंने हिन्दी को उसका अधिकार दिलाने के लिए सफल प्रयास किया है। उनके द्वारा हिन्दी के लिए किए गए संघर्षों का मैं साक्षी रहा हूं। व्यासजी ने अपनी अदम्य इच्छा-शक्ति से वह काम कर दिखाए जो बड़े-बड़े नहीं कर सके। युग तो हमेशा आगे बढ़ता है, पर वह अपने पीछे आने वालों के कंधों पर चढ़कर ही बढ़ता है।
व्यासजी आयु की दृष्टि से मेरे छोटे भाई हैं, लेकिन कर्मठता की दृष्टि से वह मुझसे बड़े व बहुत आगे हैं। न जाने कितनी यादें मेरे मन में उमड़ती आ रही हैं पुराने समय की। पूरा एक युग बीत गया। न जाने कहां गए वे लोग और वह समय ? अब तो स्मृति ही हमारी शक्ति है। व्यासजी उस स्मृति को सजाने-संवारने का काम कर रहे हैं। हिन्दी के इस पुरोधा को ईश्वर शतायु करें-यही मेरी कामना है।

 


('शलाका पुरुष पं. गोपालप्रसाद व्यास' से, सन्‌ 2001)

 

 

 

 

 

 

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