तभी मैंने एक दिन, जहां तक मुझे याद है, 'साप्ताहिक अर्जुन' में गोपालप्रसाद व्यास की ओर से एक कविता की पैरोडी कुछ यूं छपी देखी-
तुम मिलीं,
मुझे मालूम हुआ
तुम पंजाबिन हो तूफानी,
इठलाती-सी,
बलखाती-सी
उस दिन देखा,
घंटाघर के चौराहे पर
तुम चाट रही थीं खड़ी-खड़ी
उस दही-बड़े के पत्ते को
थीं मिर्चें जिसमें मनमानी।
और मैं रसिक,
उमर का ढला
थका,
और हारा,
तेरे रूप-भार,
यौवन को
सहने वाला,
जी आए सो करो
नहीं कुछ कहने वाला,
मौन
और गंभीर
शान्त,
और श्रान्त,
तेरे रूप-सरोवर में
सब रोष भुलाकर
लुट-लुटाकर
रहता हूं उद्भ्रांत।
इस कविता में व्यासजी ने अगले खंडों में से दो-चार छींटे मुझ पर और मेरी पत्नी पर भी, जिनसे उन्हीं दिनों मैंने शादी की थी, कस दिए थे। उन्होंने लिखा था-
तुम मिलीं,
मुझे मालूम हुआ-.jpg)
तुम गुड़िया हो रंगीन सजी,
जी जिसे देखते जाग उठे,
बस, दूर बुढ़ापा भाग उठे,
वह लौह भस्म की पुड़िया हो।
तुम शक्ति-स्रोत हो पारा-सी,
अंगारा-सी,
हर रोग दूर करने वाली
तुम शीशी अमृतधारा-सी।
तुम मिलीं अचानक मुझे,
देवि, मैं पूछ रहा हूं तुमसे-
मुझे विवाहोगी क्या ?
साथ लगाओगी क्या ?
मरा, जिलाओगी क्या ?
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