यारों के यार

(उपेन्द्रनाथ 'अश्क')  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

शायद एक-आध कवि-सम्मेलन में मेरी कविता और उनकी पैरोडी साथ-साथ जमीं और हमारी मैत्री में कुछ गहराई आ गई। राजनीतिज्ञों के साथ रहने के बावजूद व्यासजी में कुछ अजीब-सा अल्हड़पन है, जो मुझे हमेशा आकर्षित करता है। व्यंग्य-विनोद उनके स्वभाव का अंग है। जैनेन्द्र हों, अश्क हों, या अज्ञेय हों, अपनी कविताओं में उन्होंने सबको निशाना बनाया है। किसी को उनमें अतिरंजना अथवा कुछ खटक लग सकती है, लेकिन हास्य-रस के लेखक के लिए यह क्षम्य है। इसीलिए मैंने उन फब्तियों का बुरा नहीं माना। व्यासजी जब भी मिले, खुले दिल से, हंसते-मुसकराते मिले, फब्तियों की फुलझड़ियां छोड़ते मिले।
1941 में मैं आल इंडिया रेडियो दिल्ली आ गया और व्यासजी से प्रायः भेंट होती रही। एक दिन मैंने उन्हें मज़ाक में कहा-"यार ! तुम्हें तब मानें, जब हमें किसी कवि-सम्मेलन का अध्यक्ष बनाओ !'' कवि के नाते तब मैं वैसा प्रसिद्ध न था। एक छोटा-सा संग्रह 'प्रात-प्रदीप' छपा था और 'उर्मियां' (दूसरा संग्रह) की कुछ कविताएं लिखी थीं या शायद छप भी गया था, लेकिन यह निश्चित है कि किसी कवि-सम्मेलन का अध्यक्ष बनने की मेरी स्थिति नहीं थी। लेकिन व्यास यारों के यार हैं। कुछ ही दिन बाद उन्होंने मुझे सूचित किया कि 'ब्रज-साहित्य-मंडल' के तत्वावधान में मथुरा में एक कवि-सम्मेलन होने जा रहा है और मैं उसका सभापति मनोनीत किया गया हूं।
उस कवि-सम्मेलन की याद मेरे मन के परदे पर अमिट प्रभाव छोड़ गई है, क्योंकि उसी में मुझे पहली बार इस बात का एहसास हुआ कि कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता जैसा 'बोर' काम दूसरा कोई नहीं और मैंने कसम खा ली कि मैं कभी किसी कवि-सम्मेलन का अध्यक्ष नहीं बनूंगा और न आज तक बना हूं।
हुआ यह कि व्यासजी दिल्ली के अन्य कुछ कवियों के साथ मुझे मथुरा लिवा ले गए और वहां उन्होंने मुझे अपने एक एडवोकेट मित्र के यहां ठहरा दिया। शाम को सभा मण्डप में पहुंचे। एक बड़े हॉल में दोनों ओर कुर्सियां (अथवा डेस्क मुझे याद नहीं) लगी थीं। सामने मंच ऊंचाई पर बना था। दरी, जाजम और तकिए लगे थे और अध्यक्ष के सामने चौकी बिछी थी। बाईं तरफ माइक्रोफोन था। मुझे अध्यक्ष की चौकी पर बैठा दिया गया। एक कागज़ पर कवियों के नाम लिखकर मेरे सामने रख दिए गए। अधिकांश कवि ब्रजभाषा के थे। लंबी-लंबी कविताएं लिख कर लाए थे। समय की पाबंदी मानते न थे। जब एक कवि ने काफी लंबी कविता पढ़कर श्रोताओं को काफी बोर किया, तब मैंने उसे बैठ जाने को कहा और दूसरे कवि का नाम पुकारा। उसने माइक्रोफोन हाथ में थाम लिया और बिना मेरी (जो अपने जोम में अध्यक्ष बना बैठा था) परवाह किए, दूसरी कविता पढ़नी शुरू कर दी- पुरानी शैली में लिखी हुई झूठी भावनाओं से ओतप्रोत, अंतहीन तुकबंदी कुछ क्षण मैं सुनता रहा।

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