फिर सहसा मेरे जी में आया कि यदि मैं जोर से चीख मारकर, अध्यक्षीय गद्दी से छलांग भरकर, मंच के नीचे कूद जाऊं और चीखता हुआ हॉल से बाहर भाग जाऊं तो कैसा रहे ? जैसे-जैसे वह कवि अपनी कविता पढ़ता रहा, वैसे-वैसे मेरे मन में यही उचंग आती रही। यहां तक कि उस कल्पना में मुझे शैतानी-रस आने लगा। जवानी के दिन थे। दुनिया की परवाह नहीं थी। वह ख्याल मेरे दिमाग पर ऐसा हावी हुआ कि अजब न था यदि मैं मंच से कूदकर चीखता हुआ भाग जाता, लेकिन तभी मेरी निगाह बन्धु व्यासजी पर पड़ी, जो मेरे ही कहने पर मुझे अध्यक्ष बनाकर लाए थे और मैंने पूरी इच्छा-शक्ति से मन पर काबू रखा।
मथुरा से वापसी पर मैंने जब व्यासजी को अपने मन की स्थिति बतलाई, तब हम दोनों खूब हंसे। दोनों ने प्रतिज्ञा की कि इस मनःस्थिति को लेकर व्यास एक हास्य-रस की कविता लिखेंगे और मैं एक कहानी-लेकिन जहां तक मैंने पढ़ा है, उन्होंने ऐसे पागलपन के क्षणों को कहीं चित्रित नहीं किया और न मैं ही उसे किसी कहानी का अंग बना सका। इतना ज़रूर है कि जब-जब किसी ने कभी मुझसे किसी कवि-सम्मेलन की अध्यक्षता करने को कहा- मुझे सदा व्यासजी और मथुरा के उस कवि-सम्मेलन की याद आई है।
व्यासजी की एक अमूल्य धरोहर मेरे पास सुरक्षित है, वह है उनकी एक कविता। इसे उन्होंने अभी तक कहीं नहीं छपवाया। उस कविता को उन्होंने मेरे ही घर प्रयाग में लिखा और मुझी को दे गए। वह कविता प्रयाग के कुम्भ में घटित होने वाली उस दर्दनाक घटना के संबंध में थी, जिसकी याद आज भी लोगों को दहला देती है। इस कविता में मेले की अव्यवस्था और सरकारी रीति-नीति पर अपनी चाबुक चलाते हुए व्यासजी ने लिखा था-
''गांव-गांव में कुम्भ मनाओ !''
मैं व्यासजी को उम्र में अपने से बड़ा समझता था। आज मालूम हुआ कि वह मुझसे चार साल छोटे हैं। उनकी इस अर्द्धशती के अवसर पर मैं शुभकामनाओं के साथ-साथ बड़े होने के नाते आशीर्वाद देता हूं कि वह अभी शत-शत वर्ष जीएं। अपनी बागो-बहार तबियत से मित्रों और पाठकों का मन बहलाते रहें। इर्द-गिर्द के टुच्चेपन से अपने मन को खट्टा और हंसी को ज़हरीला न होने दें और हिन्दी-पद्य को ही नहीं, हिन्दी-गद्य को भी अपने हास्य निर्झर से सैराब करते रहें।
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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