वीररस के खंडकाव्यों में 'ततो जयमुदीरयेत्' के अनुसार नीचे की पंक्तियां देखिए-
पावन प्रताप तेरी जय हो,
हे वीर शिवा, लो नमस्कार !
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अट्ठारह सौ सत्तावन के,
वीरों का वन्दन बार-बार !!
मैं झांसी वाली रानी के,
चरणों में शीश झुकाता हूं।
नेताजी को कर नमस्कार,
मैं अपनी कलम उठाता हूं !!
जयहिन्द ! देश भारत की जय !
जय ! इस पर मरने वालों की !
आज़ाद हिन्द सेना की जय !
जय ! वीर जवाहरलालों की !!
जय अपने अचल तिरंगे की,
जो बलि का पथ दिखलाता है !!
उस राष्ट्र-सिपाही की जय-जय !
जो इस पर जान अड़ाता है !!
कथा को प्रारंभ करते हुए उस परिस्थिति का चित्रण किया गया है, जिसमें दूसरे महायुद्ध के समय अंग्रेजी फौजें ब्रह्मदेश में जापानी सेना से हारकर भागीं तथा बंगाल और असम तक लोगों में भगदड़ मच गई-
कलकत्ते के फुटपाथों पर
भूखी गंगा घहराती थी।
बच्ची माता के हाथों से,
टुकड़ों पर बेची जाती थी।
जापानियों द्वारा परास्त होकर उस समय भारतीय सेना बहुत व्यथित हुई और उसे लगा कि यदि हमारा देश आज़ाद होता तो देश को हमारे इस तरह हारने का दुःख होता। मन की इस दुःखी परिस्थिति में सुभाषचंद्र बोस ने उनको एक किया और भारत की आज़ादी के लिए लड़ने का अरमान मन में जगाया। वह एक विचित्र घड़ी थी-
उस समय समूचे भारत में,
एक अजब जलजला छाया था।
आज़ादी का दरिया अपने,
पूरे उफान पर आया था॥
होगए युवक तैयार,
देश पर अपना फर्ज निभाने को॥
माताएं आगे बढ़ आईं,
बच्चों की भेंट चढ़ाने को !!
इसी जोश और भावना से पूर्ण वातावरण में आज़ाद हिन्द फौज का निर्माण हुआ और उसने बर्मा से भारत की ओर कूच कर दिया। नेताजी ने इस आज़ाद हिन्द फौज को जो गौरव प्रदान किया, वह भुलाया नहीं जा सकता। प्रारंभ में लोगों ने इसे एक देशद्रोही सेना कहकर बदनाम करने की कोशिश की, किन्तु बहुत ही थोड़े समय में देश ने मन-ही-मन इसे मुक्ति-सेना मानना प्रारंभ कर दिया था। साधारण लोग प्रारंभ में घटनाओं को जिस दृष्टि से देखते हैं, असाधारण लोग उसे उस तरह नहीं देखते। वे तो घटनाओं के आर-पार देखते हैं-