अकसर दुनिया के लोग,
समय में चक्कर खाया करते हैं।
लेकिन कुछ ऐसे होते हैं,
इतिहास बनाया करते हैं।
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बांधे जाते इन्सान, कभी,
तूफान न बांधे जाते हैं।
काया ज़रूर बांधी जाती,
बांधे न इरादे जाते हैं।
वह दृढ़-प्रतिज्ञ सेनानी था,
जो मौका पाकर निकल गया।
वह पारा था, अंग्रेजों की --
मुट्ठी में आकर फिसल गया।
सेना में सुभाषचन्द्र का संदेश दक्षिण पूर्वी उन देशों की भारतीय जनता और सेना के लिए आशा का संदेश बनकर सुनाई दिया-
इन धूमिल बड़े पहाड़ों के
उस पार हमारी माता है।
यह वायु हमारे खेतों की,
मिट्टी को छूता आता है।
उस पार हमारी जन्मभूमि,
जो देवों को भी प्यारी है।
जिसके आगे सर्वस्व हमारा,
तन, मन, धन, बलिहारी है।
लो सुनो, हवा की लहरों पर,
आवाज तैरती आती है।
जय हिन्द ! उठो, साहस बांधो,
मां अपने पास बुलाती है।
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हम नहीं रुकेंगे आज, खून
अपने ने हमें पुकारा है।
हम भारत की संतान, वहां,
जाना अधिकार हमारा है।
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या तो हम अपना अचल तिरंगा,
दिल्ली पर फहरा देंगे।
या आजादी के पुण्य मार्ग में,
अपनी लाश बिछा देंगे॥
इस संदेश को अपनाकर आजाद हिन्द फौज देश की मुक्ति-सेना बन गई और उसने नेताजी के इशारे पर एक नया इतिहास लिखा-
हिन्दू और मुसलमान दोनों का,
रक्त हुआ इकठौरा था।
यह स्वतंत्रता के महासमर का,
पहला रक्तिम ब्यौरा था !!