केवल सैनिकों ने ही नहीं, भारत के बाहर रहने वाली भारत की जनता ने स्वार्थ-त्याग की जो झांकियां दिखाईं, वे अद्वितीय हैं। ये वैसी ही कुछ झांकियां थीं, जैसी भारत-पाकिस्तान युद्ध के समय हम आज देख रहे हैं। आज़ाद हिन्द फौज की मदद के लिए जनता में धन देने की होड़ लगी थी।

कवि ने उसी धन को धन माना है, जो बूंद-बूंद करके आज़ादी के तालाब को भर देता है-
वह धन ही क्या जो पड़ा रहे,
धरती में गड़कर दब जाए !
या बांधा जाए थैलियों में,
संदूकों में जा छिप जाए !!
जो बंद तिजोरी में रहता,
वह स्वर्ण नहीं है, मिट्टी है।
जो नहीं देश-हित में आए,
वह धन धोखे की टट्टी है॥
हम तो उसको धन कहते हैं,
जो काम गरीबों के आए।
थैली की डोरी काट चले,
आज़ाद देश को करवाए॥
यों धनिक जगत में बहुतेरे,
पर भामाशाह अकेले थे।
जो अपने धन से स्वतंत्रता की,
होली खुलकर खेले थे॥
इस खंडकाव्य का सबसे बड़ा मार्मिक अंश 'नेताजी का तुलादान' है और वह पूरा अंश ही उद्धृत किया जाए तो बात बने।
सिंगापुर में नेताजी का जन्म-दिवस मनाया जा रहा है। सारा नगर सजाया गया है। घर-घर तोरण और वन्दनवार बंधे हैं और गली-गली में गीत-गान हो रहा है। शाम को नगर में सुभाष आने वाले थे और उनका तुलादान होने वाला था। यथासमय स्वागत सभा हुई। सेनापति सुभाष ने कौमी झंडा फहराया, फौजी सलामी हुई और फूलों से सजाई हुई तुला पर नेताजी बिठला दिए गए। सबसे पहले एक बुढ़िया ने सोने की पांच ईंटें चढ़ाईं। फिर क्या था, एक-एक करके आभूषण उतारकर पलड़े पर चढ़ाए जाने लगे-
मुंदरी आईं, छल्ले आए,
जो पी की प्रेम-निशानी थे।
कंगन आए, बाजू आए,
जो रस की स्वयं कहानी थे।
आ गया हार, ले जीत स्वयं,
माला ने बन्धन छोड़ा था।
ललनाओं ने परवशता की,
जंजीरों को धर तोड़ा था।
आ गईं मूर्तियां मन्दिर की,
कुछ फूलदान, टिक्के आए।
तलवारों की मूंठें आईं,
कुछ सोने के सिक्के आए।
इस तुलादान के लिए,
युवतियों ने आभूषण छोड़े थे।
जर्जर वृद्धाओं ने भेजे,
अपने सोने के तोड़े थे।
छोटी-छोटी कन्याओं ने भी,
कर्णफूल दे डाले थे।
ताबीज गलों से उतरे थे,
कानों से उतरे बाले थे।
हर आभूषण के साथ-साथ,
एक नई कहानी आती थी।
रोमांच नया, उदगार नया,
पलड़े में भरती जाती थी।