जिसकी कलम में जोर है

(भवानीप्रसाद मिश्र )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

किन्तु वज़न पूरा नहीं हुआ, कांटा बीच में नहीं आया। तभी कप्तान लक्ष्मी एक तरुणी को लेकर आगे बढ़ीं। तरुणी का जूड़ा खुला हुआ था। रो-रोकर आंखें सूज गई थीं। तरुणी विधवा थी। अंग्रेजों की फौज से लड़ते हुए उसका पति युद्ध में मारा गया था। नेताजी ने टोपी उतारकर उस महिला का सम्मान किया और महिला ने अपने कांपते हाथों से पलड़े पर अपना शीशफूल चढ़ाया। उस सौभाग्य चिह्‌न के चढ़ते ही कांटा सहमा और थर्राया, किन्तु फिर भी वज़न अभी पूरा नहीं हुआ था। तब एक वृद्धा आगे बढ़ी और उसने नेताजी के सामने सोने से चौखटे में जड़ी हुई तसवीर लाकर डाल दी और स्वर्ण का चौखटा उससे अलग होगया। तसवीर उसके बेटे की थी, जिसे देशप्रेम के अपराध में फांसी दी गई थी। उस चौखटे के तुला पर आते ही तुला समतल होगई, कांटा बीच में आगया और तुलादान सम हुआ। बहुत मार्मिक कविता है यह। यह कविता श्रव्य-काव्य का सुन्दर नमूना है। पढ़ने में यह जितना अर्थ और भाव प्रदान करती है, वह कम नहीं है, किन्तु इसको सुनते हुए तो श्रोता का व्याकुल न हो जाना एक अनहोनी बात है। समूची पुस्तिका राष्ट्रीय भावनाओं से ओतप्रोत है।

गोपालप्रसाद व्यास भाषा के धनी हैं। ब्रजभाषा और खड़ी बोली की सभी शैलियों में वह समान रूप से धाराप्रवाह लिख पाते हैं। यह एक संयोग है कि उन्होंने व्यंग्य और विनोद के साहित्य का सृजन किया है। हिन्दी में व्यंग्य और विनोद का साहित्य कम है, इसलिए उन्होंने अधिकतर उसी क्षेत्र को सम्पन्न किया, यह एक तरह से अच्छा ही है। किन्तु उनकी अन्य रचनाओं को देखकर मुझे कई बार लगा कि व्यासजी ने हिन्दी-साहित्य के साथ और अपने साथ भी दूसरी दिशाओं की अपेक्षाकृत अवहेलना करके उचित नहीं किया है।

उनकी फुटकर राष्ट्रीय रचनाएं संख्या में बहुत नहीं हैं, और वे जैसा कि मैंने पहले कहा है, बहुत ज़रूरत हो जाने पर लिखी गई हैं। ऐसा भी हो सकता है कि चारों तरफ से मांग आने पर ये रचनाएं लिखी गई हों। किन्तु फिर भी उनमें जो बेसाख्तगी है, वह स्वयंस्फूर्त रचनाओं की ही है। एक उदाहरण लीजिए-

दर्शन बघारो मत, दुश्मन को मारो !
आतताइयों का सिर धड़ से उतारो !

बुद्ध ने कहा था क्या कहते थे गांधी ?
बोलो मत काम करो, चलती है आंधी !

हिंसा-अहिंसा के भेद मत विचारो !
संकट में मातृ-भूमि पहले उबारो !

शास्त्रों का कहना है-हनते को हनिए !
पाप नहीं मानिए न दोष नहीं गनिए !

हटना कायरता है, हिम्मत न हारो !
सिंह के सपूतो, अब बढ़-बढ़ कर मारो !

इधर चीन और पाकिस्तान के आक्रमणों की पृष्ठभूमि में भी व्यासजी ने अनेक राष्ट्रीय कविताएं लिखी हैं। उनमें से अधिकांश कविताएं रेडियो से प्रसारित होकर बहुत लोकप्रिय हुई हैं, किन्तु कम-से-कम मुझे, व्यासजी के समान सहज भाव से लिख सकने वाले कवि से इस बात की अपेक्षा है कि वह अब्दुल हमीद, आशाराम त्यागी और ऐसे उन अनेक वीरों की कहानियों को काव्यबद्ध करके हिन्दी को कुछ खंड-काव्य देंगे और उनके माध्यम से न केवल हमारा वीरकाव्य ही, किन्तु हमारी वीरता भी सम्पन्न समझी जाएगी।

('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन्‌ 1966)


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