व्यास का ब्रज-रंग

( डॉ0 नगेन्द्र )  

भूमिका
व्यासजी का व्यंग्य-विनोद
एक बहुमुखी व्यक्तित्व
दिल्ली में हिन्दी के प्राण
औटपाई गुपाल
व्यासजी ने नई ज़मीन तोड़ी है
हिन्दी भाषा और साहित्य के पुरोधा
यारों के यार
जिसकी कलम में ज़ोर है
व्यास का ब्रज रंग
हास्य के क्षेत्र में योगदान
मैं तो उस पर फिदा हूं
जो नियति से भी नहीं हारा
नारद के पिता : व्यास
गोपाल के गोपाल
व्यासजी-मेरे बालसखा
व्यास-गज़लियों-तबलियों की महफिल में
दिल्ली में एक ही वृंदावनी व्यक्तिव
कवि व्यास हास्य रस के
ब्रज की माधुरी
आदरणीय गुरुदेव के प्रति
मेरे गुरुदेव
चाचाजी
वह मुझसे मिले बिना चले गए !

काव्य-चमत्कार का पूर्ण निदर्शन उनकी यमुना नामक कविता में है। इसमें गंगा से तुलना करते हुए मथुरावासी व्यासजी ने यमुना की महिमा को अपने निराले ढंग से प्रस्तुत किया है-

कोऊ नृप सत्तम न लाए याहि रथ जोरि,
यह रसरूपा आदि अलख बखानी है।
संभु नैं न रोकी, काहू जन्हू नैं न टोकी,
ये प्रवाहमान पानी है कि भारती भवानी है ?
बापुरे विधाता के कमंडलु को पानी नाहिं,
राधिका-गुबिंद के सनेह की निसानी है।
गंगा मांहि जमुना समानी ये कहानी झूंठ,
जमुना में आई धाइ गंगा समानी है।

ब्रजभाषा के ग्वालकवि ने यमुना की महिमा पर अनेक छंद रचे हैं और सत्यनारायण ने भी यमुना का हृदयस्पर्शी वर्णन किया है। इस संदर्भ में व्यासजी के यमुना संबंधी छंदों की छटा भी दर्शनीय है। यमुना की भांति ही श्रीकृष्ण के अग्रज बलराम पर व्यासजी ने तुलनात्मक शैली में लिखकर उनकी कृष्ण से वरिष्ठता सिद्ध की है। विनोबाजी के भूदान पर उनकी प्राचीन परिपाटी से युक्त एक रचना देखिए-

अस्व न अंजन की, प्रबल प्रभंजन की,
सब्द की न, मन की न कवि-कल्पनान की।
विद्या के विवाद की न, राजनीतिवाद की ,
न प्रखर प्रचार की न काहू गुन-ज्ञान की।
ऐसी गति पेखी मैं विनोबा के पगन मांहि,
जानैं मति पंगु कीन्ही गहन-गुमान की।
रावन भुजान की न, राघव के बान की न,
गति हनुमान तै बड़ी है भूमिदान की।
व्यासजी की ब्रज-कविता में केवल उक्ति-वैचित्र्य या चमत्कार ही नहीं, सहज सौंदर्य-बोध भी स्थान-स्थान पर पर्याप्त मात्रा में पाया जाता है। इस प्रकार के कमानीदार नयनों की कहानी कहते हुए जब वह लिखते हैं-

पानीदार प्यारी के कमानीदार नैन 'व्यास'
ऐन मैन मैन की कहानी कहिबे लगे।

तो ब्रजभाषा का रीतिकाल का रंग आंखों में झलक आता है। ब्रज-कविता की रसमयी परंपरा अब लुप्त होती जा रही है। व्यासजी इसमें अब भी कभी-कभी लिखते रहते हैं, यह हर्ष की बात है। 'गोपिन के अधरान की भाषा' पुस्तक में उनकी ब्रज-कविताओं का चयन सामान्य पाठकों को रस और ब्रज-कविता के रसिकों को संतोष प्रदान करता है।


('रंग, जंग और व्यंग' से, सन्‌ 1966)


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