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साहित्यकारों में अनेक से परिचय है, अनेक से लिहाज है, अनेक से मित्रता है, पर गोपालप्रसाद व्यास से परिचय कभी रहा होगा, लिहाज मैं क्या करूंगा ? उस बेचारे का और कई का अनुभव है कि उससे मित्रता करना खतरनाक है, तो खामखाह सांप पालने का काम मैं क्यों करूंगा, पर बरसों से मैं इस आदमी के साथ एक गहरे रिश्ते में बंधा हुआ हूं ,यह सच है।
क्या है वह रिश्ता ? रिश्ता असल में होता है बराबरी वालों से और उस पट्ठे से बराबरी बांधने का दम मुझमें कहां ? सच कहने की मजबूरी सिर पर आ पड़ी है, तो फिर कोई चारा नहीं कि कहूं ! परिचय, लिहाज, मित्रता और रिश्ता उस आदमी से मेरा कुछ है नहीं, मैं तो उस पर फिदा हूं, यानि मामला कुछ उसके साथ इश्किया है-'झमक दिखा के मुझे दिलरुबा ने लूट लिया !'
बड़ी परेशानी में फंस गया हूं , उस आदमी के बारे में बात करके, क्योंकि यहां तक आते-आते यह पैना सवाल सामने है-उस आदमी की किस अदा पर रीझ गए जनाब !
सवाल पैना है ही, कडुवा है और जहां उपजा है, वहां काफी गरमी है कि न वह आदमी हसीन है, न खिलाने-पिलाने का शौकीन है, फिर ?
बात यह है जी, कि कुरसी पर उसे बैठा देखकर जी मिल गया उससे ! कुरसी तो घसीटा चौधरी के भी पास है और रशीद भटियारे के पास भी। ठीक है यह बात, पर देखने की बात तो यह है कि दूसरी की लगाई सूली पर हज़ारों हत्यारे चढ़ गए और किसी ने उन्हें न पूछा, पर अपने कंधों उठाकर लाई सूली पर चढ़ा, तो ईसा पैगम्बर हो गया !
एक शाहदरे से चलकर दिल्ली पहुंचा और एक सहारनपुर से चलकर, तो क्या दोनों को एक से नम्बर मिलेंगे ? फिर पहुंचने में एक बारीक बात पर भी नजर रखनी चाहिए कि प्रसिद्धि की जिस कुरसी पर वह बैठे, वह उनकी बनाई हुई तो थी ही, उसके बनाने में सिद्धि के औजारों से काम लिया गया था। कहूं असिद्धि से सिद्धि की और सिद्धि से प्रसिद्धि की ओर जीवन पद-यात्रा का नाम ही गोपालप्रसाद व्यास है।
सुनता हूं वह साथियों को सींग मारने में नहीं चूकते। जानता हूं बुरी बात है यह, पर जिसने अपनी राह खुद बनाई हो, जब उसकी राह रुके, तो वह उलझे नहीं ? एक बार सुना कि वह डूब गए। बात यह थी कि उन्हें डुबाने को बड़ी-बड़ी तोप-तोड़क तोपें जुटी थीं और विश्वस्त थीं कि इस उचकी से उचक असंभव है, पर वह डूबे नहीं, डुबकी मारकर निकले तो लक्ष्य पर थे। दुःख है कि हारने वालों ने गालियां दीं, तालियां नहीं बजाईं। मैं किसकी शिकायत करूं ?
यह आदमी बेहद बदलिहाज है, इंकार करने में नहीं झिझकता सुना है यह, पर जिसकी जेब में नोटों की फालतू गड्डियां हैं और जिसकी जेब में सिर्फ राशन लाने के ही नोट हैं, क्या दोनों का इंकार इंकार ही होता है ?
मुझे दावा नहीं है कि मैं उन्हें पूरा जानता हूं। लक्ष्मण सीता के कुंडलों को नहीं, बिछुवों को ही पहचानता था। मेरी भी हालत भाई गोपालप्रसाद व्यास के बारे में कुछ वैसी ही है, क्योंकि मेरा ध्यान आधी शताब्दी के लंबे कटीले पथ पर अनवरुद्ध बढ़ते, उनके पैरों पर ही केन्द्रित रहा है, और मैं भी उनकी इसी अदा पर फ़िदा हूं-मजनूं का प्यार लैला के रंग को कहां देख पाया था ?
('व्यास-अभिनन्दन ग्रंथ' से, सन् 1966)
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