एक से एक आला आदमी भरे पड़े हैं इस दिल्ली में ! नाम लेने लग जाओ तो लंबी फेहरिस्त बनेगी कि जिसका आर न पार, पर राष्ट्रपति भवन से लेकर रामलीला मैदान तक वाया चांदनी चौक जो भी सूची बनेगी उसमें एक नाम अवश्य कहीं न कहीं लिखा जाएगा। वह है पद्मश्री पंडित गोपालप्रसाद व्यास।
जब व्यक्ति सरल हो, पर व्यक्तित्व जटिल हो, ऐसे आदमी के बारे में कुछ भी कहना या लिखना कठिन हो जाता है। व्यासजी के बारे में लिखते समय यही एक कठिनाई मेरे सामने आती रही है।
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13 फरवरी को ब्रज में जन्मे और राधे का नाम लेते-लेते, क्या जपते-जपते व्यासजी दिल्ली के स्थायी निवासी होगए। स्थायी निवासी भी ऐसे कि दिल्ली का कोई भी साहित्यिक कार्यक्रम हो या सांस्कृतिक कार्यक्रम, या फिर राजनैतिक काम हो या वह महामूर्ख सम्मेलन ही क्यों न हो, व्यासजी की चर्चा दोनों तरह की होती है। व्यासजी बुलाए जाएं या नहीं बुलाए जाएं। व्यासजी को इस काम में होना या नहीं होना है। उनके अस्तित्व का सबसे बड़ा प्रमाण यह है कि उनको इसलिए भी याद किया जाए कि "भई, देखो व्यासजी को इसमें बुला मत लेना।" पर हैरानी तब होती है जब व्यासजी वहां आमंत्रितों की कतार में सबसे आगे बैठे होते हैं।
अपने आप में पंडित गोपालप्रसाद व्यास एक व्यक्ति नहीं, संस्था हैं। अपने जीवन में पचासों संस्थाओं और समारोह उन्होंने पैदा किए। एक से एक 'मुगलिया' कार्यक्रम संपन्न किए। जो काम किसी के बस का नहीं, वह व्यासजी को सौंप दो। उनकी और उनके व्यक्तित्व की परीक्षा लेने के लिए भी उनको कई आयोजन सौंपे गए, पर जब वे आयोजन निर्विघ्न संपन्न हो गए तो परीक्षा लेने वाले खुद पांवों में गिर पड़े। हमने तो आपको फंसाया ही था, पर आपने तो कमालकर के दिखा दिया। क्या आप सोच सकेंगे इसका उत्तर व्यासजी क्या देंगे ? वे अपने अंधेरे चश्मे में से न जाने कहां से देखते हुए कहेंगे- "हां, तो अब क्या कार्यक्रम है।" यानि कि अगली चुनौती के लिए वे फिर कमर कसे तैयार मिलेंगे।
मूलतः व्यासजी ब्रजभाषा के कवि रहे। खूब दूध-रबड़ी खाना, मथुरा के अखाड़ों में दंड-बैठकें लगाना और कुश्तियां लड़ना तथा जोर करना और नियमित भंग छानकर 'राधे-गोविंद' का गुणगान करना व्यासजी का अपना अतीत रहा है। पढ़ाई-लिखाई उनके वश की बात नहीं थीं। जीवन के संघर्षों में उन्होंने अनुभव की पाठशाला से 'आचार्य' की डिग्री ले ली। मदरसा छोड़ भागे। तब कवित्त और सवैयों में रसे-व्यासजी और सब कुछ छोड़ गए, पर उनसे जमुना नहीं छूटी। मथुरा के मुकाबले दिल्ली भी इसीलिए चुन ली कि वृंदावन की जमुना का दर्शन नित्य प्रति दिल्ली में होता है, होता रहे। दैनिक हिन्दुस्तान के प्रसिद्ध कालम 'नारदजी खबर लाए हैं' और 'यत्र-तत्र-सर्वत्र' को व्यासजी महाराज न जाने कब से लिख रहे हैं।
मैं अक्सर कहा करता हूं -हम अपनी प्रेमिका को नियमित रूप से एक पोस्टकार्ड भी रोज़ नहीं लिख सकते, पर व्यासजी चाहे जहां रहें, वे ये कालम बराबर लिखकर भेज देंगे। कोई पच्चीस या तीस साल से वे काम कर रहे हैं। व्यंग्य का कालम नियमित लिखना और वह भी उस स्तर का कि उसे पढ़े बिना पाठक को चैन नहीं पड़े, यह किसी तपस्या से कम नहीं।