पढ़कर 'हिन्दुस्तान' में 'यत्र-तत्र-सर्वत्र'
श्रद्धा उमड़ी, लिख दिया हृदय खोलकर पत्र।
हृदय खोलकर पत्र, निष्कपट उत्तर पाया
लेकर पहुंचे रोरी-चावल और कलाया।
याद रहेगी जीवनभर वह स्वर्णिम बेला
गुरु बने श्री 'व्यास' होगए काका चेला।।
जादू-सा कुछ होगया, बदला अपना रंग
हास्य-व्यंग्य में नित नई उठने लगी तरंग।
उठने लगी तरंग, भाग्य ने पल्टा खाया
चमत्कार दिखलाने लगी गुरु की माया।
'काका' व्यंग्य-बाण जब सम्मेलन में छूटे
बल्ली हिलने लगी मंच के तख्ते टूटे।।