
"जो जगदीश तो अति भलो, जो महीप तौ भाग।
तुलसी चाहत दुहूं विधि, राम-चरण अनुराग।"
"स्तोत्रों में स्तुति की गई-
राम रामेति रामेति रमे राम मनोरमे,
समस्रनाम तततुल्यं राम नाम वरानने।"
लेकिन मर्यादा पुरुषोत्तम श्रीराम बारह कलाओं से युक्त रहे। लोकमानस ने श्रीकृष्ण में सोलह कलाओं के दर्शन किए और घोषणा होगई-''कृष्णस्तु भगवान् स्वयं'' और कृष्ण ही क्यों, उनका गुणगान करते-करते ''व्यासस्तु भगवान् स्वयं'' बन गए। व्यास लेखक और संपादक थे तो क्या मैं उस पंरपरा में नहीं हूं।
बुद्ध और महावीर को तो भगवान् कहा ही गया है। लोकमान्य तिलक भी भगवान् कहकर सम्मानित किए गए। बचपन में हम गाया करते थे-''अवतार महात्मा गांधी है, इस गवरमेंट के मारन को।'' कहने का तात्पर्य यह है कि जिसमें भी मनुष्य को सत्य, शिव और सुंदर के दर्शन हुए, जो भी शक्तिसंपन्न और तेजोमय लगा, वही भगवान् का अवतार मान लिया गया। अवतार क्या, स्वयं भगवान् मान लिया गया। स्वयं श्रीकृष्ण भगवान् कह ही गए हैं-
"यद् यद् विभूतिमन्सत्वं श्रीमर्द्जितमेव वा।
तत् तदेवावगच्छं त्वं मम तेजोंऽश सम्भवम्।"
मैंने वेद, उपनिषद, पुराण, गीता, भागवत पढ़े। पढ़े कम, सुने ज्यादा। कुरान और बाइबल भी देख गया हूं। मन को ईश्वर में लगातार लगाने की कोशिश भी की है। यथासमय भजन और मनन भी करता हूं। लेकिन यह निगोड़ा चंचल मन ?
अंत में, जहां तक समझा वह यह कि न मैं लोक को जान पाया, न परलोक को। आत्म-तत्व की खोज में लगा हूं, परंतु उसने भी अभी तक परमात्मा तक पहुंचाने में कोई सहायता नहीं की। तो फिर जो होना है, हो। जो नहीं होना है, न हो। सार यही है -
''कर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन।''