लेकिन इतना अवश्य बता सकता हूं कि मैंने किसी की नकल नहीं की। न किसी से उधार लिया और न किसी की जूठन खाई। जो सूझा,
जो महसूसा, उसे निर्भीकता से कहा और परिणाम झेले। जनता से बहुत प्रेम पाया। भगवान ने जैसी मेरी सुनी, वैसी सबकी सुने।
व्यंग्य-विनोद के लिखने वाले सुखी रहें और सबको सुख देते रहें। कृपया वह मेरी यह बात गांठ बांध लें कि यह दुनिया नाना प्रकार के दारुण दुःखों से पीड़ित है।
सुखी से सुखी, समृद्ध से समृद्ध और शक्तिशाली से शक्तिशाली व्यक्ति के जीवन में कहीं-न-कहीं, कोई-न-कोई ऐसा डंक लगा है,
जिससे वह मन ही मन विह्वल है, उदास है और ग़मगीन है। यदि उसके मुख पर एक क्षण के लिए भी हल्की-सी हंसी उभार सकते हों तो इससे बड़ा पुण्य कार्य कोई और नहीं। मैंने एक छोटा-सा 'हास्य-गीतम्' लिखा है। इसे पढ़ें और गुनें-
शुभ्र स्वरूपम्
अमल अनूपम्
रस सम्पन्नम्
परम प्रसन्नम्
मन-मानस विलसम्
वंदे हास्यरसम् !
मंगल मोदम्
शुद्ध विनोदम्
नवरस राजम्
सुखद समाजम्
कुंठा-कष्ट कषम्
वंदे हास्यरसम् !
अंगम्-अंगम्
नाना रंगम्
हर्ष प्रसंगम्
सुमधुर व्यंग्यम्
क्रांति कर्म संगम
वंदे हास्यरसम् !
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काम न क्रोधम
विगत विरोधम्
सहज सुबोधम्
रस अनुरोधम्
स्नेह-सुधा सरसम्
वंदे हास्यरसम !
नित कथनीयम्
नित वचनीयम्
आचरणीयम्
प्रेमिल संस्पर्शम्
वंदे हास्यरसम !
हिम उल्लासम्
प्रेम प्रकाशम्
कौतुक छंदम्
परमानंदम्
वर्द्धन व्यास-यशम्
वंदे हास्यरसम् !
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('हास्य सागर' से, सन् 1996)