लेकिन विनोद (ह्यूमर) में हास्यमूलक विषय का वर्णन स्वभावोक्ति से किया जाता है और चोज़ (विट) में वह वर्णन कुछ वक्रोक्ति से किया जाता है। विनोद में जो चमत्कार होता है वह स्वाभाविक होता है, परंतु चोज़ के लिए एक प्रकार की सुसंस्कृत कल्पनाशक्ति और कला-ज्ञान की ज़रूरत होती है।''
.jpg)
इंग्लैंड के सुप्रसिद्ध चोज़-सिद्ध सिडनी स्मिथ का चोज के बारे में कहना है कि 'चोज़' में जब तक चमत्कार या विलक्षणता न हो, तब तक काम नहीं चल सकता, उसे चोज़ नहीं कह सकते। चोज में बुद्धिमत्ता का उपयोग पदार्थों के सुंदर या उपयुक्त संबंध ढूंढ निकालने के लिए नहीं, बल्कि वह संबंध ढूंढ निकालने के लिए होना चाहिए जो अनपेक्षित, अदभुत और चमत्कारजनक हो।
अंग्रेजी साहित्य में विट और ह्यूमर के विषय में विशद और बहुविध व्याख्या की गई है और इनके लिए विविध शब्दों का प्रयोग किया गया है। लेकिन हमारे संस्कृत-साहित्य में विट के लिए सुभाषित, सुप्रलाप, सुवचन (देखो अमरकोश) सुनृत, सूक्ति, चतुरालाप, विनोद-वचन आदि शब्द मिलते हैं। इसके लिए ठेठ हिन्दी का शब्द चोज़ ही रखा जा सकता है। अंग्रेजी में विट और ह्यूमर दोनों अलग-अलग शब्द हैं। कोई एक ऐसा शब्द अंग्रेजी में नहीं है जिसके अंतर्गत इन दोनों शब्दों के भाव आ जाएं। लेकिन हमारी संस्कृत भाषा में विनोद के अंतर्गत विट और ह्यूमर दोनों का भाव समाविष्ट है।
संस्कृत भाषा में काव्य के तीन भेद माने गए हैं- उत्तम, मध्यम और अधम। उत्तम काव्य में व्यंग्यार्थ प्रधान होता है, मध्यम काव्य में व्यंग्यार्थ गौण होता है और अधम काव्य में केवल शब्दों का वाच्यार्थ चमत्कारपूर्ण होता है।
संस्कृत-साहित्यकारों ने हास्यरस के आलंबन विदूषक, मूर्ख मनुष्य और बहुरूपिया बताए हैं और हास्यरस का उपकारक रस यानी वह रस जिसके सम्मिलन से उसका उत्कर्ष होता है श्रृंगार रस माना है। हास्य का विरोधी रस भयावह वीभत्स बताया गया है।
संस्कृत भाषा के प्रसिद्ध ग्रंथ 'साहित्य दर्पण' में हास्यरस के उदाहरण के रूप में जो श्लोक दिए गए हैं उनमें से एक इस प्रकार है-