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" दाता-घर जाती तौ कदर ऐसी नायँ पाती,
मेरे घर आई तो बधाई बांट बावरी।
खाने-तहखाने दस खाने में छिपाय राखौं,
होउ न उदास मेरौ यही चित्त चाव री।
खाऊं न खवाऊं, मर जाऊं तौ सिखाय जाऊं,
नाती अरु पूतन कौं अपनौ सुभाव री !
दमड़ी हू न दैंय कबौं सपने में भिखारी कौं,
सूम कहैं लक्ष्मी तू बैठी गीत गाव री !"
ब्रजभाषा के रीतिकाल में कुलटा, कुलच्छिनी, कुरूपा और कलही नारियों की भी खासी खबर ली गई है। पद्माकर कवि कहते हैं- "सापने हू कियो अपराध, आपने हाथन सेज बिछाई। तऊ कुलटा कूं दया नहिं आई," आदि। अथवा कुरूपा स्त्री का यह खाका देखिए-
"लोहे के जेहर, लोहे के तेहर,
लोहे के पायँ पयॅंजनि बाढ़ी।
नाक में कौड़ी औ कान में कौड़ी,
कौड़िन की गजरा गति गाढ़ी।
रूप में ऐसी लखाई पड़ै, मनों
नील के मांट में बोर कै काढ़ी।
ईंट लियैं बतरावै भतार सौं,
भामिनि भौन में भूत-सी ठाड़ी।"
उक्त छंदों में हास्य प्रच्छन्न रूप में ही मिलता है। लेकिन इन्हें शुद्ध हास्य की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। ऐसा ही एक कवित्त मुझे और याद आ रहा है जो लिखा तो गया है कामिनी नायिका की मनोदशा पर, लेकिन इसकी अंतिम पंक्तियां इसे हास्य में अनुपम रूप से परिवर्तित कर देती हैं-
"वा दिन ते निकस्यौ न बहोरि,
कि जा दिन आग दै अंदर पैठ्यौ।
पीर सहौं न कहौं तुम सौं कछु,
मन माखत मार मरोर उमैठ्यौ।
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'सरदार' विचारत चारु कुटैठ्यौ
न कुच कंचुकि छेड़ो लला,
कुच-कंदर अंदर बंदर बैठ्यौ।"
उरोजों को बंदर की उपमा देने वाले सरदार कवि अकेले नहीं हैं। सूरदास के कन्हैया ने जैसे ही राधा के उरोजों पर हाथ रखा तो अचानक यशोदा को देखकर बोल उठे- ''यानैं मेरी गेंद चुराई।'' ऐसे कौतुकी छंदों में लोग अश्लीलता के दर्शन कर सकते हैं। किंतु ऐसे रसिकों की भी कमी नहीं जो अश्लीलता के यथार्थ को स्वीकार करते हुए इनके पदांशों से उत्पन्न हास्य को ही अधिक महत्व देते हैं।