मन छटपटाता रहता है कि कैसे अपने को संपूर्णता से व्यक्त करूं ? तभी मुझे संस्कृत की एक सूक्ति स्मरण हो आई, ''गद्यं कवीनां निकषं वदन्ति।'' बाणभट्ट ने इस उक्ति को सार्थकता प्रदान की थी। उनकी 'कादंबरी' काल की कसौटी पर खरी उतरी थी।
परंतु मैं कोई जड़, पीली धातु नहीं हूं जो किसी भोंडे पत्थर से टक्कर लेता रहूं। मेरे पास कोई सुंदर कसौटी भी नहीं है। जो आपको देकर कहूं कि जिसे आप सोना समझते हों, जरा कसकर देखो, ताकि कलियुग की इस विभीषिका की पहचान हो सके। ध्यान से देखो कि कसौटी पर कोई रंग उभरता है या खरोंचें पड़ती हैं। परंतु यह काम मेरा या तुम्हारा नहीं है। यह काम तो आने वाले समय का है। वही समय आने पर अपनी कसौटी का इस्तेमाल करेगा। यह काम आज के साहित्याचार्यों का, विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रमी तिकड़मी डॉक्टरों का, पदों और पुरस्कारों के लिए राशन जैसी लाइन लगाने वालों का नहीं है।

समय ने मेरी भर्त्सना की, मैंने तुम्हें धनुष-बाण इसलिए नहीं दिए थे कि अपने तीर हवा में छोड़ते रहो। मेरी अपेक्षा थी कि तुम लक्ष्य-वेध करो। समझे लक्ष्य-वेध का मतलब ? देखा तुमने कभी दीन-हीन दुःखी लोगों की ओर ? पूछा अपने से कभी कि आज गरीब गरीब क्यों है ? अमीर कैसी कमाई से अपार संपत्ति का स्वामी बन बैठा है ? क्या ध्यान गया तुम्हारा कभी इस बात पर कि आज जिसके पास है, वह भी दुःखी है और जिसके पास नहीं है, वह भी दुःखी है, भला क्यों ? राजा भी दुःखी और रंक भी दुःखी ! भूमिहीन किसान भी दुःखी। शोषण से त्रस्त मजदूर भी दुःखी। नेता राज-पद पाकर भी दुःखी और जनता उसे अपना प्रतिनिधि बनाकर, नेतृत्व सौंपकर भी दुःखी। असमानता से नारी दुःखी। कुपोषण और अशिक्षा से बालक दुःखी। वृद्ध बीते हुए समय को याद कर-करके दुःखी। सब दुःखी। सब सामाजिक अन्याय से पीड़ित। सब भ्रष्टाचार के मकड़जाल में फंसे हुए। समाजसेवी समाज-परिष्कार न करके अपने परिष्कार में लगे हुए हैं। इस विडंबना की ओर भी तो ध्यान देना व्यंग्य-विनोदी लेखक का काम है कि आज मनुष्य और मनुष्य के बीच खाई क्यों पड़ गई है। धर्म नहीं, संप्रदाय कहो, अपने-अपने स्वार्थों के लिए अपने मताग्रहों को विधर्मियों पर थोपने के लिए क्या-कुछ नहीं कर रहे ?