कोई कहते हैं नहीं, वृंदावन ही ब्रज है। कोई गिरि गोवर्धन की तलहटी में बसे हुए गांवों को, यानी जहां-जहां से गोवर्द्धन दिखाई देता है, ब्रज बताते हैं। कोई कहते हैं, ब्रज, चौरासी कोस में फैला हुआ है-"ब्रज चौरासी कोस में चार गाम निज धाम। वृंदावन अरु मधुपुरी, बरसानौ नंदनाम।'' कुछ का मानना है कि ब्रज मथुरा जनपद तक ही सीमित नहीं है। ब्रजभाषा जहां-जहां बोली जाती है, ब्रज की व्यापकता की परिधि वहीं-वहीं तक जानिए। अर्थात अलीगढ़, आगरा, एटा, इटावा, मैनपुरी आदि और इधर धौलपुर, ग्वालियर, बुंदेलखंड, झांसी तक। उधर फिर डीग, भरतपुर, बयाना,

करौली, अलवर आदि जिलों में भी तो ब्रजभाषा और ब्रज-भावना की लटक पूरी तरह विद्यमान है। कुछ इस वृहत्तर ब्रज से भी संतुष्ट नहीं है। वे कहते हैं कि कृष्ण की रसमयी लीलाभूमि ही नहीं, जहां-जहां से श्रीकृष्ण का रथ गुजरा है, जहां वह बसे हैं और जहां-जहां तक उनकी गीता का संदेश गया है, वह सब ब्रज ही है। अर्थात ब्रज ससीम नहीं, असीम है। वह नयन-पथगामी भी है और पलक-कपाट लगाने के बाद भावुकों के भावना-जगत में भी अखंड रूप से विद्यमान है।
भारत में ब्रजभाषा कहां नहीं रची गई ? कहां बोली और समझी नहीं गई ? भारत के किस क्षेत्र ने अपने को ब्रजमय अनुभव नहीं किया ? कहां से आध्यात्मिक आचार्यों ने यह स्वीकार नहीं किया कि ब्रज के अवतारी महापुरुष ही कृष्णस्तु भगवान स्वयं ? इस मान्यता पर आगे बढ़ें तो एशिया में महाभारत की कथाओं के रूप में और शेष विश्व में हरे राम, हरे कृष्ण आंदोलन के रूप में ब्रज दुनिया के किस छोर में व्याप्त नहीं है ? इस व्यापकता का रहस्य क्या है ? इस पर विचार करें।
भारत मां का हृदय
भौगोलिक दृष्टि से देखें तो ब्रज भारत का हृदयस्थल है। ऐतिहासिक दृष्टि से देखें तो भारत की दो-दो राजधानियों दिल्ली और आगरा के बीच में अवस्थित मुख्य ब्रज भारत की कर्मस्थली, योगस्थली, भक्तिस्थली, साधनास्थली ही नहीं, रंगस्थली और शक्तिस्थली भी रहा है। ज्ञात इतिहास में जितने व्यापक आयामों से भांति-भांति के द्वंद्व, युद्ध, जय-पराजय, उत्थान-पतन और विनाश एवं निर्माण के जितने विविध आयामों से यह ब्रज गुजरा है